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Showing posts from 2017

कविताओं के इतिहास

कविताओं के अपने अलग ही इतिहास होते हैं कुछ दर्दीले कुछ सुखद कुछ प्रीत के पाग में पगे कुछ एक मीठे और रसीले ... धूप में जीभर तपकर आँधियों में पोर पोर सुलगकर सोंधे और सच्चे हुए से ...

परदेस गमन के बाद पहला पत्र

इस शरद पूनम बहुत याद आये तुम..... सुनो प्रिय.... परदेश गमन के पश्चात ये मेरा पहला पत्र तुमको जानते हो तुम बरसों बरस गए क़लम नही पकड़ी इन हाथों शब्द आड़े टेढ़े हो जाएं क्षमा करना अर्थ कद...

तुम आओ तब दीप जलाऊं

तुम आओ तब दीप जलाऊँ जीवन के हर तिमिर भगाऊँ रुच रुच माटी छानी काढ़ी इन हाथों ले प्रिय मैं ठाढ़ी दो हाथों ना बने दियाली तुम बिनु कैसे मने दिवाली आस की कलियाँ फूल बनाऊं मन आँगन घर ...

किसी ज़िन्दगी को फ़साने मिले

कदम दो कदम को मिला साथ लेकिन किसी ज़िन्दगी को फ़साने मिले ख़ामोश अब तक जो लब थे उन्हें फ़िर अजब औ गज़ब से तराने मिले ।। यूँ सांसें तो चलती रही उम्र से एक मगर ज्यो ये धरती थमी सी रही धड़का बहुत दिल ढले रात दिन भी कहीं फिर भी ज्यों कुुुछ कमी सी रही एक शाम वह हाथ छूकर यूँ गुज़रा इन आँखों को सपने सुहाने मिले ।। तसव्वुर में बनती रही बेबखत जो वो सूरत जो आधी अधूरी दिखी । जाने वो क्या रंग लेकर चढ़ा नभ कि होकर अधूरी भी  पूरी दिखी ।। ज़मीन आसमान मिल गए थे जहाँ फिर ऐसे कई इक ठिकाने मिले ।। आरजुओं के पंखों शुरू एक सफ़र कुछ अनजान राहें  जुदा से शहर न दिन रात के फ़ासले थे जहाँ  न मालूम वो ले चला था कहाँ सिरजने लगी ढेरो तारे चंदनिया उजालों को सौ सौ बहाने मिले   प्रियंवदा

क्षणिकाएँ

इश्क़ की राह में माना बहुत सी है मुश्किलें । एक नग़मा मोहब्बत का गुनगुनाओ तो सही। लाख कांटे बिछाए ये तेरे जहान पाँव तले। एक क़दम वफ़ा की राह में उठाओ तो सही। जुनून हो रूह में औ शि...

हृदय आकार बदलने लगता है

ह्रदय आकार बदलने लगता है ************************ हो जाये जब प्रीत ह्रदय आकार बदलने लगता है तन क्या मन क्या जीवन क्या संसार बदलने लगता है कल तक हम जो सांसे लेते थे हम यूँ ही जी लेने को एक ख्याल करत...

किन शब्दो में

किन शब्दो मे तुमको गढ़ लूँ जब जी चाहे तब मैं पढ़ लूँ । बहुत कठिन रस्ते ये प्रियतम स्वांस उलाहन कितना सह लूँ ।। नयन दृष्टि तुम तक जो जाती जग तरकश तीरे खिंच जाती । घोर सबल भीतर तुम कितने किन्तु विवशता झर झर जाती ।। एक विकल्प दो ये पीड़ा हर लूँ शब्द न निकले औ सब कह लूँ ।। अधर मुखरते स्वर हो कम्पित तुम कल्पित तनतरु आच्छादित शाख शाख अँगड़ाते चितवन  चबा चुगलियाँ चले चतुर पवन ।। कहो यत्न सुगन्धि यह ढक लूँ । जिक्र ना हो औ तुम तक चल लूँ ।। चले चन्द्रकला सों जीवन अपना घट बढ़ के आवंटित हर सपना।। काल अमावस नहि कोई गणना । और चन्द्रिका चौमुख सुनो बखना ।। धार दुधार रीति यह कुंद कर लूँ । लोक न लोके मिलन मैं रच लूँ ।। प्रियंवदा

उजड़ी नींदों का सफर भी

उजड़ी नींदों का सफर भी फ़िर सुहाना हो गया। गुज़रा यूँ छूकर वो पलके कि दीवाना हो गया।। करवटों पर लिख रहा था जब दर्द कुछ इबारतें । सिलवट ए मन खोलते वो तो परवाना हो गया ।। ख्वाब हो ह...

सताए को दुनिया क्यो सता जाती

अटक राहों टिकी नज़रें भटकता मन विकल मेरा ज़माने की लगी बंदिश बड़ा ज़ालिम है यह पहरा मिलन मन जागते ही झट कुचल देती तेज़ धड़कन नमी आंखों की पीते हैं  छुपाते सबसे रंज और ग़म वो एक जो छाँ...

चुराया जिस अदा से दिल

कभी नादानियाँ भाती कभी जी भर सताती है ।। कभी मन गुदगुदा जाती बेवजह भी रुलाती है । ये कैसी प्रीत है उसकी लड़कपन मुंह चिढ़ाता है किसी पल चाँद दे जाए तो दूजे छीन जाता है ।। हथेली पर सितारे रख कभी मुस्का गया झिलमिल पसारी चाँदनी छत पर चुरा कर ले चला चुन बिन।। फूंककर गम के बादल को नज़र ने चूम ली पूनम । बहाना ले अमावस का अंधेरे रख गया तिन तिन ।। खेल रूठने मनाने का उसको बेहद लुभाता है । इश्क मशहूर है उसका जो जीभर जी जलाता है ।।  माथ सिलवट शिकन को देख पल में सहम जाये वो। सबर आँखों जो झर जाए तो खुद से रूठ जाए वो।। कहूँ अब और क्या प्रिय तुम ये जुल्मी खेल मत खेलो । चुराया जिस अदा से दिल उसी से जान भी ले लो ।। प्रियंवदा अवस्थी

मेरे और तुम्हारे दरम्यान

मेरे और तुम्हारे दरम्यान अक्सर ही सैकड़ों बातें लहरों सी आकर ठहरी हैं इन नर्म किनारों पर.... और फिर बस,, क्या तुम और क्या मैं ? सुनहले सूरज की तरह औंधते हुए से सारे गम एक दूजे की धर...

उजड़ी नींदों का सफर

उजड़ी नींदों का सफर भी फ़िर सुहाना हो गया। गुज़रा यूँ छूकर वो पलके कि दीवाना हो गया।। करवटों पर लिख रहा था जब दर्द कुछ इबारतें । सिलवट ए मन खोलते वो तो परवाना हो गया ।। ख्वाब हो ह...

वो पीर दिखाई दे मुझको

जो पीर दबी तेरे अंतस में वो पीर दिखाई दे मुझको। सौ जतन ढाँप लो किन्तु हर चीर दिखाई दे मुझको। अधरों पे रख मुस्कान सहज सैकड़ो बात बनाते हो । कर नखट चुहल नादान भाव कुछ इतर जताते हो...

मूरत से सूरत बना दोगे

स्तब्ध हो जाती हूँ तुम्हारी कल्पनाओं से किन्चित चकित भी                  कभी पत्थर से दरिया बहाते हो                  कहीं पानी मे आग लगाते हो                  मौत में जीवन ...

प्रिय तुम बैठे थे पास

रात्रि नींद जब आ बैठी इन पलकों को सहलाते । प्रिय बैठे आ निकट मेरे जग को ज्यों झुठलाते ।। मंद सुगन्धि पवन लाई रच जिसको दोनों महके मुखरित होकर अधर रुके जाने क्या कहते कहते ।। स...

ये कौन हुआ है आज किसी का

ये कौन ? हुआ है आज किसी का कि कि अनछुए ही निष्प्राण हुई मुस्कराहट हो उठी मुखरित लगकर हृद की चौखट शुष्क रुष्ट तप्त आक्रांत  स्वेदित नम हथेलियों पर ठहरी हैं कब चपल इच्छाओ की र...

कुछ जब हम तुम ढूंढ रहे थे

मिलन मधुर था,,,,,, कुछ जब हम तुम ढूंढ रहे थे कल धुंधलाई दो आँखों में अश्रु धार थी मौन प्रवण था दो नयनो की मुलाकातों में ,,,,, कजरे गजरे गज़र बिंधे सब कम्पित तनमन रुंधे कंठ तब चंद्रकलाय...

डाल गुलाबी ओढ़नी

डाल गुलाबी कुर्ती मखमल जो ओढ़ी धानी ओढ़नी धर कटि पर सतरंगी घाघर चली ठुमक ज्यो मोरनी झनक मटक अह चली पवन मन ही मन कुछ बांचते पात पात चुम्बन कर चिहुंकी उड़ी गगन को नापते लिख भेजे सन्देस पीयु क्या अधर बीच रख इठलाई  पता नही आगे पीछे की रह रह फिर नयनन मुस्काई  पुष्प पुष्प कर भेंट चली बगियन बगियन तितली सी दृष्टि जिधर स्पर्श करें उठे कौंध वहीं एक बिजली सी प्रीत सजन की बड़ी बावरी इसकी कोई क्या ही बोले लग जाए जिस भी तनमन नभ चूमे मदन हिंडोले ।।

दिल की आंखों वो सब कुछ देखता

दिल की आँखों से वो सब कुछ देखता रहता है । कितने मुँह की सुनी कि ये प्यार अंधा होता है ।। मन की मन से समझ जो चल दिए सफर में यहां उससे बेहतर कभी कोई रिश्ता यहाँ क्या होता है ।। मौसम...

बंधी हूँ तुम संग ऐसी डोर

अभिलाषाएं अगणित अनंत हृद प्रिय तुम संग जिनका कोई ओर न छोर बंधी हूँ तुम संग ऐसी डोर धरो रूप कितने ही कैसी भी छटा बदल लो तुम धूप छाँह शीत बरखा जो कुछ भी ला रख दो तुम विचलित ना होऊ...

कोई मुझ सा अगर मिले

बहुत मिलेंगे इस ज़माने में तुझे चाहने वाले कोई मुझ सा अगर मिले तू मुझे खबर करना ।। मुझे खबर है ये कि तू चेहरों को पढा करता है । कोई कभी दिल तेरा पढ़े तू मुझे खबर करना।। जब कभी नम ज...

मंदिर मंदिर क्यों भटकूँ

मंदिर मंदिर क्यो भटकूँ मैं जब तुम हृदय विराजे रग रग तन्मय प्रेम तुम्हारे भाल तुम्ही हो साजे नयन ज्योति आरती उतारूँ मैं तुमपर सब हारी तुम संग लगन लगी है जबसे सुध बुध बिसरी स...

बड़ी गहरी उदासी है

बड़ी गहरी उदासी है रेत फिर आज प्यासी है निचोड़कर रख दिये आसमान ने वजूद क्षार क्षार हुई ज़िंदगी बिखरी बिखरी हवा सी है रौंदा है इस कदर उजालों ने अपनी पैनी निगाहों से गुबार ए दिल ...

उसमे भी है जान

नश्तर खुलते ही पुराने हो जाता है सब कुछ बेसाज़ लिपट जाती है जब कानो फिर फिर एक वही आवाज़ रिश्ता ही कुछ ऐसा जिसे पुकारा सृष्टि का आधार होता रहा जो सदियों से समय बेसमय तार तार नि...

मुश्किल दरवाजों से गुजर

ज्ञान का एक असीम भंडार मस्तिष्क बस एक सोच ही होगी कुछ क्लिष्ट पग पग हृदय पथ दिखाता रहा हाथ पकड़ एक यही जड़ न कर पाई कहीं अपना घर क्यों न अब कुछ एक दिन ऐसा कर लें इन पञ्च पटों की आभ...

यूँ तो हुजूम सा है

यूँ तो एक हुजूम सा है दिल के आशियाने में ये भीतर फिर कोई यूँ बेक़दर तन्हा क्यों है ।। निगाह मेंभी  है वो और हद ए निगाह में भी है। फिर ये रास्ता दरमियाँ वो इतना लंबा क्यों है।। महक उठते हैं हम जिसकी आहट भर से । वो ही एक गुल गुलशन से गुमशुदा क्यों है ।। बिछे बैठे हैं ज़माने से जिनके कदमो तले । वो बात बात दिल ए जज़्बात रौंदता क्यों है ।। लबों पे उफ़ नही कोई न ही निगाहों में शिकन।  दिल में बैठा हैतो आंखों से उफनता क्यों है ।। प्रियंवदा अवस्थी©2015

तुम भी तो आधे दिखते

जो हम ना होते रंग श्वेत श्याम तुम्हे कौन बुलाता ऐसा ही होता है प्रियतम रंग रंग का रिश्ता नाता ।। ज्यों भोर अधूरी बिन रैना धवल काले बिन आधा सुख आधा बिनु दुःख चाखे जय आधी बिन बा...

मैं तो तेरी नगरी चलती हूँ

इन दो आँखों की कश्ती में साजोसामान सभी रखकर। धाराओं का रुख करती हूँ मैं तो तेरी नगरी चलती हूँ ।। पल प्रतिपल पार बुलाते हो औ मुखर इधर मुस्काते हो । किस धार बहूँ बोलो तब प्रिय ...

लौट आना बेफ़िकर

लौट आना बेफ़िकर जब भी तुम्हारा दिल करे तोड़ देना नींद जो तन्हा ख्वाब लग जाये गले ।। मैं हर पल राह देखती हूँ । जब भी आवाज़ सुनती हूँ ।। वो एक दर्पण कभी जिसको संग साथ था निहारा किसी ...

दरक रहा भीतर यह कौन

ना जाने क्यों गुमसुम से तुम.... मुझमें भी चुप यह आज कौन  ... किस गति को थाम रहा अन्तस् स्वांसों उलझा अव्यक्त मौन... फिर झरे निझर मन के मोती फिर कुछ एक स्मृतियां रीती  ... कुछ कुछ बिखरे छिटके वादे... कुछ गहराए उथले रिश्ते नाते.... करते आवंटन सब आपस में गीले सीले से अधि पावस में क्या खोया खोज लगी चाहत पाया क्या तोल रहा अध पौन..... निसि वासर चक का एक व्यूह जीवन विधि विडम्ब का समूह कूटे छीटे बीने कितना जीवन अर्पण प्रतिअर्पण और तर्पण दिखता बाहर समतल सपाट फिर दरक रहा यह भीतर कौन.... ना जाने क्यों कुछ विह्वल तुम प्रतिपल गहराता मुझमे कौन .... किस गति को थाम रहा अन्तस् स्वांसों उलझा अव्यक्त मौन ..... प्रियंवदा©2017

एक तेरे नाम से अब मेरा नाम

शहर की गलियों में चर्चा आम होने लगा है। एक तेरे नाम से अब मेरा नाम होने लगा है ।। वो जो बैठे थे अब तलक मुँह पर ताले डाले । ज़ुबाँ से उनकी नेक यह काम होने लगा है।। कोई बोला निगाहन और कोई जुबानी बोला। हवाओं का रुख़ बेहद बेलगाम होने लगा है ।। झूठ कहते कि बेकारी भरी है इस दुनिया में । जिस तरफ़ देख लो नया झाम होने लगा है।। वो चौबारा जो मुद्दत से दिखता था सून सान । मुद्दा ए चर्चा ए इश्क का मुकाम होने लगा है ।। शौक ए ज़माना की बात क्या कहें कहो तुमसे। ख़बर ए अखबार का इंतजाम होने लगा है ।। प्रियंवदा अवस्थी©2015

सीप के घर ठिकाना चाहती हूँ

आज कुछ गुनगुना रहा है दिल आज कोई गीत गाना चाहती हूँ। धड़कने सुर सजा रही कुछ ऐसे साज़ ए दिल मैं बजाना चाहती हूँ।। महकते गेसुओं एक गुथ बनाकर खुशबू तुमपर उढ़ाना चाहती हूँ । तुम चम...

जाकी अँखियों तेरी प्यास

बैठी चुप आगार मैं प्रज्वल दीपक दिशि चार । हर झोंके से लड़ रहीं पलकें निज बाँह पसार।। दिशा भरम ना हो तुम्हेे ये दुनिया सजा बाजार। आ जाओ हृद प्रेम भर मोरी बाती जले कुम्हार ।। टल...

कैसे ये गुनाह हो गया

कैसे कहूँ कि कैसे यह गुनाह हो गया अपनी ही रंजिशों दिल तबाह हो गया ।। कोई नही था वो मेरा पर कोई लगा मुझे इस बदगुमानी से मेरा निक़ाह हो गया ।। खिड़की से झाँकता जो आसमाँ का चाँद क्य...

तुझे जीतना तो जुनून न था

तुझे जीतना तो जुनूँ ना था मेरी हार ही में मेरी जीत है।। तुझसे हारना मेरी प्रीत है । मेरी प्रीत ही मेरी जीत है ।। मेरी फिक्र मत कर रहगुज़र मैं हवा हूँ बहती रही सदा ।। मिल जाऊं हर ...

मेरा कहीं फिर निशाँ ना रहे

तुझ पे खर्च दूँ मैं ये जिंदगी कि मेरा कहीं फिर निशाँ ना रहे मुझे तुझको पाकर खोने की दहशत कोई फिर जवाँ ना रहे।। इशक घोल दूँ तेरे मन के समंदर कि बन जाऊँ नमक मैं तेरी बेसुआदी शिका...