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तुम पूरा चाँद ले आना

कल्पनाओं के शहर में अक्सर ही तुम्हारे साथ,,,, बादलों के गलीचे पर लेट हवाओं से अटखेलियां करते, नन्ही नन्ही ख्वाहिशों के सैकड़ों सितारे फूंके थे  मैंने तुम पर,,,,, उन सब को बटोर एक दिन तुम पूरा चाँद ले आना,,,, बड़े दिन हुए ज़मीन को, अँधेरे से लड़ते हुए,,,,, 19/2/2016 प्रियंवदा अवस्थी

एक दिन तुम आये बसन्त से

एक दिन तुम आये जीवन मे  मधुरम मधु मधुमय बसन्त से.... बस अन्तस् अतिशय गहराए  रन्ध्र रन्ध्र  रतिमय बसन्त से भ्रमित नेत्र औ शुष्क अधर थे डगमग डग पग डगरमगर थे आस धरा रवि ताप शिखर था स्वप्नों के गृह कठिन प्रहर थे सहसा पवन कान लग बोला पोर पोर ठिठुरन हृद डोला उलझ सुलझ घुँघर अलकों से इक भँवरा संग चित के खेला  ओस कपोलो चुनकर प्रीतम इठलाये उपवन बसन्त से...... श्रावण सीझ गया तन मन को भाद्र बटोरे गंध मदन को  शिशिर हाथ शीतलता बैठी गुंथे शीत बिरहा मोतिन को दिशा फेर प्रिय जब मुस्काये लाज ओढ़ बैठी अंचल को झंकृत रोम रोम अनबूझी  कण कण तुम दमके बसन्त से..... प्रियंवदा

कुछ ऐसा ही मौसम था न वह

याद तो होगा अब भी तुम्हें,, कुछ ऐसा ही मौसम था न वह जब दुःख से पहाड़ हुए किसी ठिठुरते दिन  को ज़मीन कुरेदती धूप की पैनी  नज़र से मिलते ही नज़र  मिल गए थे तुम बेहद बेकल बेघर,,,,,,,,, सुख दुःख से पुरनम हथेलियाँ आपस मे उलझाते ही  आँधियों की बात चल निकली थी,,, हालात भी कम तूफ़ां न हुए थे,,, फोड़ देने को आसमान सर पर कितना घड़घड़ाए थे बादल रह रह कर ,,, बिजलियाँ भी कम न गिरीं थी चाहतोआसपास,,,,, बेहिसाब बत्तीसियां किटकिटाते,,, तुमने और मैनें बरसों देखी फिर अफवाहों के जंगलों की वो दुर्दांत दावानल,,,, जो बुझते बुझते ही बुझ सकी थी शायद,,, हाँ शायद ही कह सकती हूँ अब भी ,,,, क्योंकि,,,, ये हुस्न और इश्क की बातें बनते ज्यों बेहिसाब अश्कों के तक़ाज़े..... धुआं अब तलक उठ रहा है उस मोड़ पर,,,, हुई बेमौसम बारिशें जिधर जी भर,,,,, सुनो,,,, देख लेना कभी पलटकर,,,,,, शायद कोई अब तक सुलगता हो भीतर ही भीतर..... प्रियंवदा