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Showing posts from April, 2017

कुछ जब हम तुम ढूंढ रहे थे

मिलन मधुर था,,,,,, कुछ जब हम तुम ढूंढ रहे थे कल धुंधलाई दो आँखों में अश्रु धार थी मौन प्रवण था दो नयनो की मुलाकातों में ,,,,, कजरे गजरे गज़र बिंधे सब कम्पित तनमन रुंधे कंठ तब चंद्रकलाय...

डाल गुलाबी ओढ़नी

डाल गुलाबी कुर्ती मखमल जो ओढ़ी धानी ओढ़नी धर कटि पर सतरंगी घाघर चली ठुमक ज्यो मोरनी झनक मटक अह चली पवन मन ही मन कुछ बांचते पात पात चुम्बन कर चिहुंकी उड़ी गगन को नापते लिख भेजे सन्देस पीयु क्या अधर बीच रख इठलाई  पता नही आगे पीछे की रह रह फिर नयनन मुस्काई  पुष्प पुष्प कर भेंट चली बगियन बगियन तितली सी दृष्टि जिधर स्पर्श करें उठे कौंध वहीं एक बिजली सी प्रीत सजन की बड़ी बावरी इसकी कोई क्या ही बोले लग जाए जिस भी तनमन नभ चूमे मदन हिंडोले ।।

दिल की आंखों वो सब कुछ देखता

दिल की आँखों से वो सब कुछ देखता रहता है । कितने मुँह की सुनी कि ये प्यार अंधा होता है ।। मन की मन से समझ जो चल दिए सफर में यहां उससे बेहतर कभी कोई रिश्ता यहाँ क्या होता है ।। मौसम...

बंधी हूँ तुम संग ऐसी डोर

अभिलाषाएं अगणित अनंत हृद प्रिय तुम संग जिनका कोई ओर न छोर बंधी हूँ तुम संग ऐसी डोर धरो रूप कितने ही कैसी भी छटा बदल लो तुम धूप छाँह शीत बरखा जो कुछ भी ला रख दो तुम विचलित ना होऊ...

कोई मुझ सा अगर मिले

बहुत मिलेंगे इस ज़माने में तुझे चाहने वाले कोई मुझ सा अगर मिले तू मुझे खबर करना ।। मुझे खबर है ये कि तू चेहरों को पढा करता है । कोई कभी दिल तेरा पढ़े तू मुझे खबर करना।। जब कभी नम ज...

मंदिर मंदिर क्यों भटकूँ

मंदिर मंदिर क्यो भटकूँ मैं जब तुम हृदय विराजे रग रग तन्मय प्रेम तुम्हारे भाल तुम्ही हो साजे नयन ज्योति आरती उतारूँ मैं तुमपर सब हारी तुम संग लगन लगी है जबसे सुध बुध बिसरी स...

बड़ी गहरी उदासी है

बड़ी गहरी उदासी है रेत फिर आज प्यासी है निचोड़कर रख दिये आसमान ने वजूद क्षार क्षार हुई ज़िंदगी बिखरी बिखरी हवा सी है रौंदा है इस कदर उजालों ने अपनी पैनी निगाहों से गुबार ए दिल ...

उसमे भी है जान

नश्तर खुलते ही पुराने हो जाता है सब कुछ बेसाज़ लिपट जाती है जब कानो फिर फिर एक वही आवाज़ रिश्ता ही कुछ ऐसा जिसे पुकारा सृष्टि का आधार होता रहा जो सदियों से समय बेसमय तार तार नि...

मुश्किल दरवाजों से गुजर

ज्ञान का एक असीम भंडार मस्तिष्क बस एक सोच ही होगी कुछ क्लिष्ट पग पग हृदय पथ दिखाता रहा हाथ पकड़ एक यही जड़ न कर पाई कहीं अपना घर क्यों न अब कुछ एक दिन ऐसा कर लें इन पञ्च पटों की आभ...

यूँ तो हुजूम सा है

यूँ तो एक हुजूम सा है दिल के आशियाने में ये भीतर फिर कोई यूँ बेक़दर तन्हा क्यों है ।। निगाह मेंभी  है वो और हद ए निगाह में भी है। फिर ये रास्ता दरमियाँ वो इतना लंबा क्यों है।। महक उठते हैं हम जिसकी आहट भर से । वो ही एक गुल गुलशन से गुमशुदा क्यों है ।। बिछे बैठे हैं ज़माने से जिनके कदमो तले । वो बात बात दिल ए जज़्बात रौंदता क्यों है ।। लबों पे उफ़ नही कोई न ही निगाहों में शिकन।  दिल में बैठा हैतो आंखों से उफनता क्यों है ।। प्रियंवदा अवस्थी©2015

तुम भी तो आधे दिखते

जो हम ना होते रंग श्वेत श्याम तुम्हे कौन बुलाता ऐसा ही होता है प्रियतम रंग रंग का रिश्ता नाता ।। ज्यों भोर अधूरी बिन रैना धवल काले बिन आधा सुख आधा बिनु दुःख चाखे जय आधी बिन बा...

मैं तो तेरी नगरी चलती हूँ

इन दो आँखों की कश्ती में साजोसामान सभी रखकर। धाराओं का रुख करती हूँ मैं तो तेरी नगरी चलती हूँ ।। पल प्रतिपल पार बुलाते हो औ मुखर इधर मुस्काते हो । किस धार बहूँ बोलो तब प्रिय ...

लौट आना बेफ़िकर

लौट आना बेफ़िकर जब भी तुम्हारा दिल करे तोड़ देना नींद जो तन्हा ख्वाब लग जाये गले ।। मैं हर पल राह देखती हूँ । जब भी आवाज़ सुनती हूँ ।। वो एक दर्पण कभी जिसको संग साथ था निहारा किसी ...

दरक रहा भीतर यह कौन

ना जाने क्यों गुमसुम से तुम.... मुझमें भी चुप यह आज कौन  ... किस गति को थाम रहा अन्तस् स्वांसों उलझा अव्यक्त मौन... फिर झरे निझर मन के मोती फिर कुछ एक स्मृतियां रीती  ... कुछ कुछ बिखरे छिटके वादे... कुछ गहराए उथले रिश्ते नाते.... करते आवंटन सब आपस में गीले सीले से अधि पावस में क्या खोया खोज लगी चाहत पाया क्या तोल रहा अध पौन..... निसि वासर चक का एक व्यूह जीवन विधि विडम्ब का समूह कूटे छीटे बीने कितना जीवन अर्पण प्रतिअर्पण और तर्पण दिखता बाहर समतल सपाट फिर दरक रहा यह भीतर कौन.... ना जाने क्यों कुछ विह्वल तुम प्रतिपल गहराता मुझमे कौन .... किस गति को थाम रहा अन्तस् स्वांसों उलझा अव्यक्त मौन ..... प्रियंवदा©2017

एक तेरे नाम से अब मेरा नाम

शहर की गलियों में चर्चा आम होने लगा है। एक तेरे नाम से अब मेरा नाम होने लगा है ।। वो जो बैठे थे अब तलक मुँह पर ताले डाले । ज़ुबाँ से उनकी नेक यह काम होने लगा है।। कोई बोला निगाहन और कोई जुबानी बोला। हवाओं का रुख़ बेहद बेलगाम होने लगा है ।। झूठ कहते कि बेकारी भरी है इस दुनिया में । जिस तरफ़ देख लो नया झाम होने लगा है।। वो चौबारा जो मुद्दत से दिखता था सून सान । मुद्दा ए चर्चा ए इश्क का मुकाम होने लगा है ।। शौक ए ज़माना की बात क्या कहें कहो तुमसे। ख़बर ए अखबार का इंतजाम होने लगा है ।। प्रियंवदा अवस्थी©2015

सीप के घर ठिकाना चाहती हूँ

आज कुछ गुनगुना रहा है दिल आज कोई गीत गाना चाहती हूँ। धड़कने सुर सजा रही कुछ ऐसे साज़ ए दिल मैं बजाना चाहती हूँ।। महकते गेसुओं एक गुथ बनाकर खुशबू तुमपर उढ़ाना चाहती हूँ । तुम चम...

जाकी अँखियों तेरी प्यास

बैठी चुप आगार मैं प्रज्वल दीपक दिशि चार । हर झोंके से लड़ रहीं पलकें निज बाँह पसार।। दिशा भरम ना हो तुम्हेे ये दुनिया सजा बाजार। आ जाओ हृद प्रेम भर मोरी बाती जले कुम्हार ।। टल...

कैसे ये गुनाह हो गया

कैसे कहूँ कि कैसे यह गुनाह हो गया अपनी ही रंजिशों दिल तबाह हो गया ।। कोई नही था वो मेरा पर कोई लगा मुझे इस बदगुमानी से मेरा निक़ाह हो गया ।। खिड़की से झाँकता जो आसमाँ का चाँद क्य...

तुझे जीतना तो जुनून न था

तुझे जीतना तो जुनूँ ना था मेरी हार ही में मेरी जीत है।। तुझसे हारना मेरी प्रीत है । मेरी प्रीत ही मेरी जीत है ।। मेरी फिक्र मत कर रहगुज़र मैं हवा हूँ बहती रही सदा ।। मिल जाऊं हर ...

मेरा कहीं फिर निशाँ ना रहे

तुझ पे खर्च दूँ मैं ये जिंदगी कि मेरा कहीं फिर निशाँ ना रहे मुझे तुझको पाकर खोने की दहशत कोई फिर जवाँ ना रहे।। इशक घोल दूँ तेरे मन के समंदर कि बन जाऊँ नमक मैं तेरी बेसुआदी शिका...

आज की रात मेरे संग

आज की रात ज़रा संग बैठो पल दो पल आज की रात मुरादों की रात है हमदम ।। मांग लो मुझसे मुझे मैं ग़ैर नही हूँ कोई मेरे काबू नही जज़्बात सम्हालो हमदम ।। बाद मुद्दत के ये हसीं चाँद रात है ...

न जाने क्यों

ना जाने क्यों गुमसुम से तुम.... मुझमें भी चुप यह आज कौन  ... किस गति को थाम रहा अन्तस् स्वांसों उलझा अव्यक्त मौन... फिर झरे आज मन के मोती फिर कुछ एक स्मृतियां रीती  ... कुछ कुछ बिखरे छिट...

कल चाँद कह रहा था

ये जो रंग भर दिए तुमने बेरंग फ़िज़ाओं में खुशबू सी भर गई है बहती सी हवाओं में ।। होठों पर गीत ओ सरगम देकर चले गए हो । कोई नूर बस गया है बुझती सी निगाहों में ।। तेरी बातें सिरजकर के रख ली हैं सिरहाने खामोशियाँ मचलके लगी ख्वाब गुदगुदाने ।। इस दौर ए इश्क की तो हर बात है सुहानी मेरे लफ्ज़ लगे गढ़ने मीठी सी एक कहानी ।। कल चाँद कह रहा था तुम भी बदल रहे हो। कागज़ पे दिल के कोई एक बात लिख रहे हो।। वो बात चलो न हम तुम आईने को बतलायें। नज़रें चहक ले और कुछ हम भी बहक जाएं ।। प्रियंवदा अवस्थी©2013

पियु लाये चुनरिया लाल

पियु लाये चुनरिया लाल ओढ़ मैं उन्हें रिझाऊं नख शिख करके श्रृंगार आज खुद पे इतराऊँ आँगन करें बात बहलाव लिए नैन मुख कौतुक भाव चमक उठे हर आहट पाके कब झलक मोरी दिखलाऊँ,,,, कंगन हार ...

ख्वाब है ये जिंदगी

दिल अदद पत्थर हुआ यूं चोट खाई ज़िंदगी । आंख ही बहती रही बह ना सकी ये ज़िंदगी ।। वो खफ़ा मुझसे है या फिर है ख़फ़ा ये जिंदगी बात कुछ भी हो मग़र नही ज़िंदगी सी ज़िंदगी।। रोशनी घुलता अंधेर...

जब से तुम मिले हो

जब से तुम मिले हो *************** जबसे तुम मिले हो उच्चारण सरल हो गए शब्दार्थ भावार्थ सब समझ आने लगे सन्दर्भ ही ऐसे सजाए तुमने कि प्रासंगिक हो गईं मेरी हर एक पंक्तियाँ ..... वरना तो हम सिर्फ ...

कुछ और ही हो जाती हूँ

जब जब तुम मौन हो जाते हो यूं ही बातों ही बातों में जाने क्या कह जाती हैं आंखें तुम्हारी.... कि बिखर बिखर पड़ती हैं मोतियाँ पूरे घर आँगन छनक उठती है पायल सन्नाटों को चीरकर कड़क उठ...