जब भी कभी पूंछते हो,,,

*सुनो प्रिय*

*अनसुलझे बालों पर गुंथी हुई*
*मोगरे की इन कलियो ने*
*अक्सर ही तुम्हारी खुशबू को*
*मुझ तक पहुंचाया है*
*जब भी कोई अलबेला सा*
*हवा का झोंका मुझसे टकराया है*
*अभी कल ही की तो बात है,*
*बिलकुल तुम सी ,*
*नटखट एक सुगन्ध आकर*
*स्वप्न में कुछ यूँ मिली थी मुझसे.....*
*कुछ कुछ चेहरे पर झुकी हुई*
*कानों में बहती हुई, कुछ कहती हुई*
*जानते तो तुम भी हो सब..*
*कब भाया था मुझे यूँ रात रात भर*
*चांदनी को चुनना बीनना ?*
*चाँद की घट बढ़ देख रीझना और खीझना*
*तुम ही कहो न कुछ बंद लिफ़ाफे खोलकर*
*भीतर खौलता हुआ सा मौन तोड़कर.....*
*सो जाऊँ फिर आज मैं गहरी नींद*
*तुम्हारी आहटोे सोंधी हुई*
*रेशम की ठंडी चादर ओढ़कर*
* यूँ खुद से खुदी में सिमटना,*
*पलकों के मोतियों को सबसे छुपा*
*लिहाफ़ों की गुपचुप कोरें काढ़ना*
*आँखें मींच फिर आसमान पर*
*कितने ही मौन सन्देसे गढ़ना*
*सब कुछ जोड़ तोड़ कर भेज देती हूँ*
*हर रोज,,,,वो जो कुछ भी तुमसे है पाया ...*
*और वो सब कुछ भी , जो तुम्हारा मुझे भाया*
*अजनबी सी हर उगती सुबह को,*
*पहचानी सी मुस्कान में गूँथ....*
*फिर फिर महका लेती हूँ वो सुगन्ध*
*जब भी कभी दिन ढ़ले ,पूँछ लेते हो*
*बस यूँ ही,,,,,,अनायास आकर*
*बड़े दिन हो गए  .....कुछ नया सा सुनाया नही तुमने*
प्रियंवदा अवस्थी

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