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Showing posts from October, 2022

तुम आओ तब दीप जलाऊँ

तुम आओ तब दीप जलाऊँ जीवन के हर तिमिर भगाऊँ।। रुच रुच माटी छानी काढ़ी इन हाथों ले प्रिय मैं ठाढ़ी ओ कुम्हार मन की सुन पाओ भ्रमित हुआ ये चाक चलाओ दो हाथों से ना बने दियाली तुम बिन कैसे मने दिवाली आस के मोती फूल बनाऊँ मन आंगन घर द्वार सजाऊँ ।। तुम आओ तब दीप जलाऊं.... दिन दिन अट जौ धान तपाये चुन चुन जीवन भार भुंजाये अंसुवन मिसरी डली बनाई भर भर मुठियन थाल लगाई अनुक दीप चुप बैठी बाती कालनिशा बन जाए न राती तुम आओ तब अगन जगाऊँ प्रीति भाव चहुँ दिसि पसराऊँ तुम आओ तब दीप जलाऊँ... सावन भीगा भादों सीझा चहुँ दिशि अब पतझर है रीझा खेत पड़े खलिहान खड़े हैं तुम बिन सब बेकाज डरे हैं आई नवल फसल की बारी कर बैठी प्रिय सब तैयारी कब तक सूखे धान पसाऊँ तुम आओ नव फसल लगाऊं.... तुम आओ तब दीप जलाऊँ प्रियंवदा अवस्थी

तुम आओ तब दीप जलाऊँ

तुम आओ तब दीप जलाऊँ जीवन के हर तिमिर भगाऊँ।। रुच रुच माटी छानी काढ़ी इन हाथों ले प्रिय मैं ठाढ़ी ओ कुम्हार मन की सुन पाओ भ्रमित हुआ ये चाक चलाओ दो हाथों से ना बने दियाली तुम बिन कैसे मने दिवाली आस के मोती फूल बनाऊँ मन आंगन घर द्वार सजाऊँ ।। तुम आओ तब दीप जलाऊं.... दिन दिन अट जौ धान तपाये चुन चुन जीवन भार भुंजाये अंसुवन मिसरी डली बनाई भर भर मुठियन थाल लगाई अनुक दीप चुप बैठी बाती कालनिशा बन जाए न राती तुम आओ तब अगन जगाऊँ प्रीति भाव चहुँ दिसि पसराऊँ तुम आओ तब दीप जलाऊँ... सावन भीगा भादों सीझा चहुँ दिशि अब पतझर है रीझा खेत पड़े खलिहान खड़े हैं तुम बिन सब बेकाज डरे हैं आई नवल फसल की बारी कर बैठी प्रिय सब तैयारी कब तक सूखे धान पसाऊँ तुम आओ नव फसल लगाऊं.... तुम आओ तब दीप जलाऊँ प्रियंवदा अवस्थी

तुम आओ तब दीप जलाऊँ

तुम आओ तब दीप जलाऊँ जीवन के हर तिमिर भगाऊँ।। रुच रुच माटी छानी काढ़ी इन हाथों ले प्रिय मैं ठाढ़ी ओ कुम्हार मन की सुन पाओ भ्रमित हुआ ये चाक चलाओ दो हाथों से ना बने दियाली तुम बिन कैसे मने दिवाली आस के मोती फूल बनाऊँ मन आंगन घर द्वार सजाऊँ ।। तुम आओ तब दीप जलाऊं.... दिन दिन अट जौ धान तपाये चुन चुन जीवन भार भुंजाये अंसुवन मिसरी डली बनाई भर भर मुठियन थाल लगाई अनुक दीप चुप बैठी बाती कालनिशा बन जाए न राती तुम आओ तब अगन जगाऊँ प्रीति भाव चहुँ दिसि पसराऊँ तुम आओ तब दीप जलाऊँ... सावन भीगा भादों सीझा चहुँ दिशि अब पतझर है रीझा खेत पड़े खलिहान खड़े हैं तुम बिन सब बेकाज डरे हैं आई नवल फसल की बारी कर बैठी प्रिय सब तैयारी कब तक सूखे धान पसाऊँ तुम आओ नव फसल लगाऊं.... तुम आओ तब दीप जलाऊँ प्रियंवदा अवस्थी

नारी

कि मन क्यों व्यग्र करती हो क्यों निज सुख भग्न करती हो जलाती बेवजह जीवन  आत्मा रुग्ण हो करती  तुम्ही तो श्रृष्टि हो सारी तुम्ही हो हाँ तुम्ही नारी तुम्हारे हाथ में नभ है तुम्ही से ही यहाँ सब है तुम्ही जननी तुम्ही भरिणी मन क्यों दग्ध करती हो ज़रा सी बात मन ढहना जगत की रीत है कहना करो प्रतिकार अनुचित का नही बंधन सदा सहना  सहज हो तुम कठिनतम भी हृदय रखती, दया करुणा बराबर तुम खड़ी सुख दुःख सरल हर पंथ करती हो क्यों दुःख के यज्ञ करती हो क्यों मन को व्यग्र करती हो..... प्रियंवदा