एक साँझ फिर मिलना तुम
एक साँझ तुम फिर उसी तरह मिलना मुझे
सागर के उस एकांत छोर पर
सिर्फ और सिर्फ मेरी प्रतीक्षा करते हुए,,,
जहाँ टिमटिम करते से
कितने ही टूटे हुए सितारे
तेज हवाओं के झोंको से बचा ,
छुपा आये थे हम तुम साथ मिलकर,
नम रेत के गहरे भीतर,,,
फुर्सत में कभी इनसे
अपनी अपनी ख्वाहिशें कह लेने को,
बरसों गुज़र गए...जीवन की उलझी गुत्थियां खोलते
ख्वाहिशों की सब बातें ,वक़्त पर टालते,,,
मन का पंछी तो रोज़ ही उड़ा है
यहां ,लम्बी उड़ाने...कितनी ही बार देखा मैंने उसे
तुम्हारी झुकी पलकों पर
सकुचाई सी व्यापकता लिए
खुले अधखुले अधरों
जब तब आ बैठी ठिठकी मुस्कानों में
उम्मीद करती हूँ,,नही खोले होंगे तुमने अब तक
मेरे बिना वो मुँदे कपाट
न जाने क्यों '''
दिन तो उग ही जाता है हर रोज
पर अब शामें नही ढलती
बेफिक्री की वो फुर्सत लिए
सुनो उधर की रेत पर ...अब तक नमी बसी तो होगी न
वक्त के साथ लहरों ने कहीं उधर अब
आना जाना तो नही छोड़ दिया...???
प्रियंवदा अवस्थी
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