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Showing posts from January, 2023

अधूरा ग्रंथ

अतीत के पन्नों से ..... सन १९८५  में लिखी एक रचना....          अधूरा ग्रन्थ,...           ----------         मन ...मन ही तो है...         सोचा करता है...         किया करता है...       एक ग्रन्थ तैयार करने की  सोची...         नाम रखा था...''मानव""         कुछ परिभाषाएं पढ़ी          सहायतार्थ....         कुछ इस प्रकार निकली           मानव की व्याख्या ....          है सच्चा मानव वही..          जो दयावान हो..          परमार्थी ..चरित्रवान हो...          स्वावलंबी-गुणों की खान हो...          परमार्थ में जिए...          परमार्थ करते  मरे            किन्तु अफ़सोस... ...

क्या ऐसी कोई रीत प्रीत

क्या ऐसी कोई प्रीत रीत तुमने भी कभी...  ------------------------------------------------  सज धज वो डोली आई थी लाखों अरमान संग लायी थी एक छोर लहू को रख सहसा एक डोर बंधी चली आई थी कहो क्या ऐसी कोई प्रीत रीत तुमने भी कभी निभाई थी एक माटी से दूजी आकर  खुद मुरझाई जड़ें जमाई थी एक उपवन महकी खिली बहुत एक मधुबन लगी बनाये थी बाबुल प्यारी माँ की लाडो जो तनिक हवा कुम्हलाए थी  झुनक पुलक नव घर आँगन सतहों से गर्द हटाए थी एक खटके पर जगते सोते प्रतिपल अंतस दहशत जीते  बसी नए देश रची नए भेस  जित ममता समता परछाई थी कच्चे धागों की आड़ लपेटे अनगिन अखण्ड ताने बाने खींचे सब अपनी ओर उसे उसको ही थे सब सुलझाने दो हाथों जिसने एक समय सौ मांगों वफ़ा निभाई थी जन्म जन्म के रिश्तों पर विश्वास हृदय जीती हो जो समदृष्टि करो देखो उसको हर दर्द सहज पीती है वो दूजे के चेहरे खिले देख  जो रोम रोम मुस्काई थी शमन दमन चाहत करते सहज विषम विष भी पीकर रही रात जगी सारी फिर भी ममता उठ पड़ी कमर कसकर थे हाथ घाव फिर भी जिसने वत्सल मन रोटी पकाई थी घर बड़ा मिला या फिर छोटा माना उसको ही सुख का गाँव रही चादर छोट...

उसने कहा पीड़ा

मैंने कहा  प्रेम -उसने कहा.... ***************** मैंने कहा - प्रेम उसने कहा पीड़ा मैंने फिर से कहा -प्रेम इस बार वो पूंछ ही बैठा- कैसे? घण्टों बैठी रही मौन हाथ थामे उसका .... फिर पूँछा- अब कहो- प्रेम या पीड़ा... नम आँखों से बोला  शायद तुम सही... या फिर कुछ कुछ मैं भी.... किंचित आश्वस्त  मुस्कान सहेजी मैंने  आँचल की कोर पर.... फिर अचानक ही न जाने कहाँ गुम गया वो... दुनिया की भीड़, भरी दोपहर.. खोजी जो ठहरा करता होगा कही अब भी  प्रेम में पीड़ा की खोज  किन्तु विश्वास है मुझे किसी एक दिन जब भी ये नम हथेली उसका हाथ थाम बैठ जायेगी उसकी हर पीड़ा निरर्थक हो जायेगी जीवन शोध को उन्मुख  उसकी सोच की,,, एक प्रति और बढ़ जायेगी ..... प्रियंवदा अवस्थी 2012©

भीगी पाती

नितांत गहरे और सर्द सन्नाटे में तुम्हारी यादों का लिहाफ ओढ़े  दिसंबर को एक बार फिर जनवरी में तब्दील होते  नीरवता से निहार रही हूँ..... तुम्हें पाकर, खोने के बाद नींद और सपनों की आपस में ऐसी अनबन हुई है कि दोनों एक दूसरे की तरफ़ बेमुरव्वती से पीठ घुमाकर बैठ गए हैं ठिठुरती देह के भीतर  सिमटती गर्माहट में सावन अब भी उतना ही ज़िंदा है जैसा उस आख़री पल मैनें तुम में छोड़ा था....  नस नाड़ियों शिरा धमनियों में अलबेली प्रीत का मयूर मदमस्त हो नर्तन करता है उमड़ घुमड़ मन के सघन मेघों के  झरझर बहकर थम जाने के बाद भी मन के मौसम में जाने क्यों कोई विशेष परिवर्तन नही होता.... उम्मीदों की किरण  पलकों पर अटकी शबनम से टकराकर परावर्तित हो जाती है,, मन के आकाश पर अब इंद्रधनुषी झूले नही पड़ते,,,,, दिन की तपिश  अपना  कितना भी चरम चूमे यादों से पसीझी गलियारी में उमस नही पनपती..... सीले सीले अंधकार में हथेलियां आपस मे उलझाए  भीनी सी एक खुशबू  टहल करती मिलती है,,, खुशबू ,,,  शायद हमारे आखिरी मिलन की...... ढलते वक़्त की मुंडेर पर चढ़ खिल उठे चांद को देख चहककर ठिठक गई ...