अधूरा ग्रंथ
अतीत के पन्नों से ..... सन १९८५ में लिखी एक रचना.... अधूरा ग्रन्थ,... ---------- मन ...मन ही तो है... सोचा करता है... किया करता है... एक ग्रन्थ तैयार करने की सोची... नाम रखा था...''मानव"" कुछ परिभाषाएं पढ़ी सहायतार्थ.... कुछ इस प्रकार निकली मानव की व्याख्या .... है सच्चा मानव वही.. जो दयावान हो.. परमार्थी ..चरित्रवान हो... स्वावलंबी-गुणों की खान हो... परमार्थ में जिए... परमार्थ करते मरे किन्तु अफ़सोस... ...