भीड़ और एकांत की तन्हाई

फर्क था बहुत,
सचमुच,,,,,
एकांत में पसरी हुई तन्हाई
और भीड़ में कुचली हुई
तन्हाई में,
कितनी ही बार
एक खोजी मन और
दो सरल नयन,,,,,
दोनों के घण्टों,
रह रह कर होते
भावनात्मक सम्प्रेषण के
परस्पर मूक रेखाचित्रण
उकेरते देखता रहता है
एक सत्यनुरागी दर्पण ,
"दोनों ही कुछ गढ़े
कुछ अनगढे,,,,"
आपस में
मिलते जुलते रहते हैं,,,
"बहुत कुछ,"
कहते समझते रहते हैं,,
एकांत की तन्हाई ,
भीड़ की चोटिल तन्हाई को
नर्म परों से सहला
जिस्म को रूहानी
और रूह को आसमानी बना,,,,,
निकल पड़ती है
सपनो के देश को
प्रियंवदा अवस्थी

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