तुम्हारे शहर में

तुम्हारे शहर में आज हवाओं का यूँ पहरा होगा
एक रूठा हुआ मौसम और दर्द का सहरा होगा

कई दिन गए दिल को यहाँ फुरसत मिले शायद
कई दिन बाद यादों का बादल फिर गहरा होगा

मुड़ के देखना वहीं किसी दरख्त के आस पास
कोई इंतज़ार में तेरे अब भी कहीं ठहरा होगा

धूप की मार से तुड़ मुड़ गया है जिसका वजूद
वो एक गुल उसके गेसू की तरह सुनहरा होगा

हर तरफ़ आवाज़ देता है तुझे यादों का मौसम
उसे अहसास न था कानों से वक़्त बहरा होगा


प्रियंवदा अवस्थी

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