मेरा बचपन लौट रहा है

मेरा बचपन लौट रहा है
जीवन की जम्हाई में 
चक्की चूल्हे खेल रहा पुन
जा मिटटी की गहराई में 
सखा सहेली सब आ जाते 
चितवन एक तनिक घूमते ही
हर मुट्ठी खुशियाँ भर लाती
गुप छुप कुछ खेले गुनते ही
कर्तव्यों के बोझ नही पर
फिर भी कितने कर्मठ बन हम
घर छत आँगन लिप पुत जाते 
अल्हड़ मन बन चन्दन चन्दन
कपड़ों के गुड्डे गुड़िया संग
अनगिन ही रास रचा डाले
माटी के कुल्हड़ भर भर कर
सोंधे हर स्वप्न पका डाले
जाति लिंग उमर भेद किधर 
क्या होता ऊँच नीच धनवान 
टोले भर के हमजोली आ
बन आये प्रिय अतिथि प्रधान
प्रीत रीत एक अंतहीन परिभाषा
रिश्तों का कोई ब्यौपार नही
साथ बैठ मिल जब किये चुहल
मन गया एक त्यौहार तहीं
मेरा यौवन लौट रहा फिर
जीवन की तन्हाई में
रोम रोम लिख रहा प्रीत
फिर पतझर सी तरुणाई मे

प्रियंवदा अवस्थी

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