लिख देते तुम आँगन सावन
अँखियों ऊपर बैठी है जो
एक आस बहुत वो प्यासी है
लिख देते तुम आँगन सावन
फिर तनमन आज भिगो लेते,,,
भीगी सीझी इन पलकों पर
गीले सीले कुछ स्वप्न बिंधे
पुरवा संग जरा लिपट बहते
इनको फिर तनिक हवा देते,,,,
गहर घहर घुमड़े भीतर
बात अधर जो कह न सके
नभ बादल तनिक गरज उठते
कानो वह तुम्हें बता देते,,,,
भीगी धरती पदछाप बने
तुम तक कैसे आ पाऊँ मैं
मेघा पुरजोर बरस पड़ते
बह तेरी चौखट आ लगते,,,
प्रियंवदा
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