मत बीतो ऐसे तुम मुझमे

मत बीतो मुझमे तुम ऐसे ,जैसे सब कुछ बीत गया
समय विकट प्रतिद्वंदी सोचे लो फिरसे वो जीत गया।।

एक डगर है एक सफर है दो तन का दो प्राणों का
क्या करना प्रिय हमको जग के तरकश वाणो का।।

सम अर्पण जब धरम हमारा एक रंग है भावों का
तुम से मैं से परे प्रीत है गाओं नित नित गीत नया।।

भले बिकल हो पंथ हमारा लक्ष्य अटल औ साथ रहे 
सूरज आग गिराये तन पर बादल बिजुरी पीर भरें।।

पतझर आये सावन जाये मन मिरदा मरुथल न बने
ऐसे मत रूठो अधजल में, जग बिहंसे सब डूब गया।।

नही पीड़ तन के मुरझाये मन पल्वित मन साथ हुए
परस देह का क्षण भंगुर है चेतन जब चेतन हो छुए

नख शिख के श्रृंगार अमर आत्मतत्व का सत्व पिए
मत खोजो सूरज उजास जो साँझ समापन रीत गया

मत बीतो मुझमे तुम ऐसे, जैसे सब कुछ बीत गया।।
प्रियंवदा

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