बहुत दूर चलना एकाकी

बहुत दूर  चलना एकाकी पथ चारों ओर अँधेरा ।
आ जाओ इक बार पुनः यह हाथ पकड़ लो मेरा ।।

निज पग की आहट भी सुन मन भयभीत बड़ा है।
परछाई सा तन ठिठका जड़ बनकर दीन खड़ा है ।।

माना पथ दुर्गम था फिर भी बहुत सबल था साथ ।
निकल पड़े डग बदल अचानक तजकर मेरा हाथ।।

क्या कमतरी रही जीवन क्यों मुरझा मन का फूल ।
संझा से सुर्खी छीनी निशि मांग भरी क्यों  धूल ।।

पथ संगी सहसा सूझी क्यों मंजिल नई बनाने की।
भूले वचन और वे सारी कसमें साथ निभाने की।।

मूक अवाक खड़े तकते नभ शायद मुझे पुकारो ।
आलिंगन भरकर नयनों की आख्या नयन निवारो ।।
प्रियंवदा

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