छानी है जब से
छानी है जबसे रेत पर तुमने प्रीत की चाँदी तम घूँटते अजब मन मिठास घुल रही है मौसम बदल रहा है घन याद तेरी छूकर आँचल की आड़ कोई मोरनी मचल रही है धरती गगन की आभा रखकर नवल परों पर मोहित मयूर नयनों से पीर झरझर कोई जीत गढ़ रही है बरसों से खुश्क धरती यौवन पे रीझ बरबस प्रियतम की एक चितवन श्रृंगार गढ़ रही है शब्दों से खेलना प्रिय तेरा शौक मेरा शगल है जितने ये बह रहे है उतनी प्यास बढ़ रही है ।। प्रियंवदा©2013