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Showing posts from June, 2023

मैं थी तुम थे

मैं थी , तुम थे संग संग उस क्षण मध्य खड़ी  तन्हाई थी जाने किस पथ चल कर वह  भीतर घर करने को आई थी,,,, अगल बगल कुछ कुछ टूटा था  समय बड़ा बेसुध बिखरा था  कजली थी कानो में गुंजित कंठ ग़ज़ल भर्राई थी खिले पुष्प शाखा से गिरकर झरे पात सावन से मिलकर स्वांस समीर मेघ आलिंगन द्युत दामिनि चुंधियाई थी देह अदृश थी भले चक्षु से मिले हृदय आलोड़ित हृद से  योग योगिनी  के सुयोग की मिलन कथा, युग युग वियोग की प्रेम प्रवाह धार बन अविरल  अंखियन से उफनाई थी प्रियंवदा अवस्थी

यहाँ कभी कभी

 #यहाँ  #कभी #कभी #ऐसा #भी #होता #है दुनिया की अनुभवी नज़रों में  अरसे से  आलिशान सा था जो एक घर ... गलती से खुली रह गयी  खिड़की के भीतर से कल  किसी एक मकान सा  झांकता दिखा वह विकल.... रेशमी दोहरनुमा मोटे पर्दे के उस पार टकटक ताकती  शून्य में लगातार   कोई टूटता सितारा आँकती दिखी सूनी सूनी सी नज़रें भी........ अँधेरे की मुँडेर पर आ बैठे चाँद के रक्तिम नैनों में चढ़ी सी दिखती खुमारी थी और वे नज़रे बड़ी ही काली  और बेहद कजरारी थीं ..... पर शायद .... उसके आसमान में कहीं  जरूर कुछ दरारें थीं..... शाम से गुलाबी होठों पर खूबसूरती से गढ़ी गयी थी  जैसे महीन कशीदेकारी..... ओढ़ रखी थी बदन पर उसने झिलमिल परम्पराओं की ओढ़नी  फुलकारी...... फूंक दी हो फिर किसी ने भी  मोहिनी उस स्तम्भित चरित्र पर छिड़क दिए हों कितने ही सोंधे इत्र नम हवाओं ने   उसपर... सावन में  टपकती हुई  छत माथे पर छलछला उठी बूंदे दीवारों से रह रहकर  उठती हुई वाष्प  कह रही थी बहुत कुछ  मौन होकर..... कि क्या कुछ न सुलग रहा होगा  कबस...

पतझर के मौसम जवानी की फुनगियां

सुनो प्रिय.... पतझर ओढ़ते हुए मौसम में बूढ़े होते कुछ दरख्तों पर जवानी की अनगिनत फुनगियां  एक बार फिर निकल पड़ी हैं..... नन्ही नन्ही कोपलों की आपस में कनखियों खुसफुसाने की चिरपरिचित सांसारिक कला बहुत कुछ अबोले ही बयान कर रही है.... बहारों के हर रंग का आस्वादन कर परिवर्तन में परावर्तन को  समझने और समझाने का  ज्यों पुनः समय आने को है .... दिन रात और दिन के फेर के सत्य को स्वीकारने की घड़ी, उथलपुथल भरे मन के मौसम में, घर आँगन और दहलीज के अलावा कहीं भी इतने गहरे सन्नाटे नही होते... जब बाहर की घुम्म से बेचैन होकर भीतर की त्राहि बेतहाशा शोर करती हो... समय की तयशुदा डगर पर चलकर पुरानी हुई हड्डियों की संधियों का आपसी घर्षण, और शोर , देह की निपात और सन्निपात की हर स्थिति परिस्थिति से जूझकर सारी दैहिक ऊष्मा बटोर जंगल जंगल भटकती हुई प्रतीत होती है.... कर्म धर्म का पथ बुहार चेतना अंततःजंगली घास के सूखे ढेरों पर ठहर सावन की गीली सीली मिट्टी के मोहक आलिंगन में अपना पोर पोर भिगोकर ज्यों उर्वरा बन जाना चाहती हैं...... जैसे बतलाना चाहती हो जग को बौराये बचपन के मस्तानेपन के साथ जीभर खेलकर गदरा...