मैं थी तुम थे
मैं थी , तुम थे संग संग उस क्षण मध्य खड़ी तन्हाई थी जाने किस पथ चल कर वह भीतर घर करने को आई थी,,,, अगल बगल कुछ कुछ टूटा था समय बड़ा बेसुध बिखरा था कजली थी कानो में गुंजित कंठ ग़ज़ल भर्राई थी खिले पुष्प शाखा से गिरकर झरे पात सावन से मिलकर स्वांस समीर मेघ आलिंगन द्युत दामिनि चुंधियाई थी देह अदृश थी भले चक्षु से मिले हृदय आलोड़ित हृद से योग योगिनी के सुयोग की मिलन कथा, युग युग वियोग की प्रेम प्रवाह धार बन अविरल अंखियन से उफनाई थी प्रियंवदा अवस्थी