नही बनानी रिश्तों की बोन्साई
प्रेम ,,,
मन की अनन्त गहराइयों में उतर
तुम्हारी जड़ों को कुरेद और कुतर
तुम्हारी प्रकृति से खेल नही सकती
तुम्हारी नैसर्गिक उन्मुक्तता को
जबरन ऊसर में ठेल नही सकती ।।
वक्त के साथ भले हो गए संकुचित
पथरीले दिल दिमाग और ये शहर
नही करना स्वार्थ का ऐसा संवरण
ऋतुओं संग चढ़े ढ़ले तेरी तरुणाई
तेरी जंगली प्रवृत्ति ही सदा से लुभाई
मुझे नही बनानी रिश्तों की बोन्साई ।।
बालिश्तों में समूचे वजूद को नापकर
आत्मतृप्ति को तेरे अधिकार छांटकर
चिटकते ही अंतरंग कोपल औ शाखाएं
क्यों कर तुमसे भला यूँ छीन ली जाएँ
ऋतुओं के गीत क्यों ग़ज़ल जाये छाई
मुझे नही बनानी रिश्तों की बोन्साई ।।
प्रियंवदा
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