बोलो था वो कौन सा गहना
नयन झुके और बोल गए कम्पित अधरों की भाषा
मन पतंग उड़ चला गगन खींचती डोर नई परिभाषा
डाल डाल कभी पात पात खिल उठी बसंती धूप सी
चपल चक्षु चुम्बन करती तितली एक अति अनूप सी
लगा रही संग पवन होड़ नटखट अल्हड़ अलबेली
थी कल तक जो सहज आज बनी है अजब पहेली
बोलो ना क्या बांध गये तन उस क्षण मतवाले नैना
पहन जिसे इतराई दिन भर था वो कौन सा गहना ।।
प्रियंवदा
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