वो जब साथ है तो
वो जब साथ है तो अकेले कहाँ हम
कि फिर ख्वाब आधे अधूरे कहाँ है।
संवरने लगे वो जो निगाहों समाकर
जहान में तलाशूं जरूरत कहाँ है।।
ज़मीन आसमान चाँद सूरज वही है
हर एक शै उसी से उसी से तो मैं हूँ
दिलों के मिलन का फ़साना मोहब्बत
कहो फासले दरमियाँ फिर कहाँ हैं ।।
रहे मुझमे होकर जुदा जिस्म सा वो
अंधेरों थमा दे चराग तिलस्म सा वो
रूह ए सुकून चल रहा साँस के संग
जहाँ उसको ढूंढे वो बाहर कहाँ है ।।
प्रियंवदा अवस्थी
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