कदम दो कदम को मिला साथ लेकिन किसी ज़िन्दगी को फ़साने मिले ख़ामोश अब तक जो लब थे उन्हें फ़िर अजब औ गज़ब से तराने मिले ।। यूँ सांसें तो चलती रही उम्र से एक मगर ज्यो ये धरती थमी सी रही धड़का बहुत दिल ढले रात दिन भी कहीं फिर भी ज्यों कुुुछ कमी सी रही एक शाम वह हाथ छूकर यूँ गुज़रा इन आँखों को सपने सुहाने मिले ।। तसव्वुर में बनती रही बेबखत जो वो सूरत जो आधी अधूरी दिखी । जाने वो क्या रंग लेकर चढ़ा नभ कि होकर अधूरी भी पूरी दिखी ।। ज़मीन आसमान मिल गए थे जहाँ फिर ऐसे कई इक ठिकाने मिले ।। आरजुओं के पंखों शुरू एक सफ़र कुछ अनजान राहें जुदा से शहर न दिन रात के फ़ासले थे जहाँ न मालूम वो ले चला था कहाँ सिरजने लगी ढेरो तारे चंदनिया उजालों को सौ सौ बहाने मिले प्रियंवदा