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मेरे और तुम्हारे दरम्यान

मेरे और तुम्हारे दरम्यान अक्सर ही सैकड़ों बातें लहरों सी आकर ठहरी हैं इन नर्म किनारों पर.... और फिर बस,, क्या तुम और क्या मैं ? सुनहले सूरज की तरह औंधते हुए से सारे गम एक दूजे की धर...