चलो फिर से घरौंदे बनाते हैं
चलो फिर से हम, घरौंदे बनाते हैं ...
चलो गुड्डे गुड्डी का ब्याह रचाते हैं..
तुम बारात ले आना सपनों की
हम पलकों पर उन्हें सजाते हैं
तुम चाँद का सेहरा बांध आना
हम तारों की चूनर ओढ़ आते हैं...
सुनो...दादी के भण्डार से,
कुछ बताशे भी ले आना अपने साथ
ज़िन्दगी बड़ी बेस्वाद हो गयी इन दिनों
चलो कुछ मिठास बांटकर खाते हैं...
इसमें कुछ स्वाद बसाते हैं ...
पर याद रहे ,,, इस बार,,,पहले की तरह
जो हिस्सा कम हो जाये तुम्हारा
मेरी भूल से...
तो रूठकर, घरौंदा तोड़ मत जाना
उस दिन की तरह,जाते-जाते....
तुम्हें क्या पता....?
बड़ी मुश्किल से हैं ये बन पाते...
प्रियंवदा अवस्थी
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