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कल्पनाओं की कलोल कन्दराओं में

सुनो प्रिय मेरे हर लिखे में अलिखे को समझ कर विचरने लगोगे जिस किसी भी दिन तुम कल्पनाओ की कलोल कन्दराओं के मध्य तराशी हुई जीवनाकृतियों को अपनी उंगलियों के पोरों से हौले से ...