कि लौट आओ अब तुम....
सूने अँधेरे एक घर में
तनहा तनहा एक दिल...
अक्सर ही बियाबान रातों को
आँखों के चराग रोशन किये
देखता है बस राह तुम्हारी...
तुम जो बरसों बरस पहले
कहकर गये कि अभी आता हूँ
पलट अब तक न आये ...
एक एक कर बिछड़ गए मेरे अपने
बचे हैं शेष बस कुछ एक सपने
छत आँगन पसरे हुए
बेजान सूखे पत्तों की तरह
जिन्हें समेटा करती हूँ हर रोज
और ये फिर फिर बिखर जाते हैं
यहाँ वहां ..किस्मत की आँधियों जूझ
मेरे वजूद की तरह ..
कि लौट आओ अब तो ..
नहीं बची और ताकत खोखल जिस्म में
धुंधला रही नज़र भी बाट देखते
इस आस में अब कहीं ये सांस न टूट जाये
और ये जो एक घर है ...
कल किसी शाहीन का मकबरा न बन जाये .....
प्रियंवदा
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