काश मौन को तुम फिर फिर दोहराते
सुनो प्रिय
तुम्हारे होने और न होने के मध्य उपजे
सन्नाटों का बेलगाम होता हुआ आर्तनाद
चीर देना चाहता है जैसे शरीर का अस्तित्व
वेध कर रख देना चाहता है समूचा आकाश
मिटा देना चाहता है जीवनदायी दरिया को
बना देना चाहता है तृण तृण खारा सागर
मौन की क्लिष्ट भाषा वेदना की तप्त स्याही
कुरुक्षेत्र सा मनसंग्राम शरशैया पड़ी सी चेतना
वियोग संयोग के छोर पर बंधे सूर्य और चन्द्र
कितनी ही बार साँझ की सिंदूरी मुंडेर पर बिठा
दिखाया था मैंने तुम्हें जीवन का परिदृश्य
पढ़ाई तो थी मौन की अशाब्दिक भाषा
सुनाई भी तो थी किसी बुझते हुए दिन की
सर्द गर्म स्वरित आह के कम्पित मूक नाद को
पढ तो डाली थी तुमने फिर अविलम्ब ,
आतुरता वश स्वतः ही शब्द प्रति शब्द ,
कितनी ही उजली और काली रातों की सुगबुग
किन्तु .....विडम्बना....
काल के विष गर्भ में वो सारे ही परिचय समाहित
अविष्कृत का तिरस्कृत हो जाना कितना पीड़ादायी
आशाओं से उऋण हो पाना उतना ही असहज,,,,,,
काश ! कि मौन को तुम कभी फिर फिर दोहराते,,,,
प्रियंवदा अवस्थी
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