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Showing posts from 2019

स्त्रियाँ बेहद सरल और सुगम्य होती है

सुनो मुझमें बसने वाले मेरे तुम तुम्हें अब तक  न जाने कितनी ही पातियाँ लिखी  जिन्हें एक एक कर करीने से सहेज रखा है मैंने दिनोदिन पुरानी और जर्जर  होती सी सन्दूकची में किसी एक दिन जब तुम फुर्सत होगे और हम भी उऋण हो चुके होंगे रिश्तों के हर लेन देन से निकल चलूंगी तुम्हारे साथ नदी के समागम की मिठास से सम्मोहित  ठहरे हुए अमावस के उस सागर की तरफ जहाँ तुमसे मेरी पहचान हुई थी बिठाकर तुम्हें वहीँ साहिल पर निसार दूँगी सब के सब तुमपर मेरे आँचल में भरकर.... मेरे हाथों में लिपटी स्याही देखकर अक्सर ही तुम्हारे कौतुक को खुद से उलझते देखा है मैंने सुनो तुम्हें ये कहते सुना हैअक्सर  स्त्रियों को समझ सकना बड़ा कठिन है वे कब क्या और कैसे के व्यूह में उलझाए ही रखती हैं  हमेशा पढ़ना तुम लहर लहर  साहिल से अनवरत टकराती  अनकहे ,,,,,,, गिरते थमते ,,,शोर करती स्त्री मन की जीवेषणा के  उन अनगिनत मौन आग्रहों को  जो चाहते हुए भी उसने  कभी जग जाहिर नही किये .... वस्तुतः उन पत्रों में तुम्हारे मन मे रह रह कर उठते कुतूहल सा ऐसा कुछ विशेष भी नही दिन प्रतिदिन के मकड़जाल...

मदमस्त और मदान्ध का भेद

एक दिन तुम्ही ने कहा था  यूँ ही बातों बातों में जब भी कभी जी करे, चली आना चुपचाप बिना कोई हंगामा किये, ताप सन्ताप व्यतिपात के इस जग को बिना  चिलचिलाते उलाहने दिए,,, उपेक्षाओं से क्यों ही करना मन का उत्पीडन जीवन के आधारभूत तथ्य ही जब मंडन और खंडन , सब कुछ ठंडा पड़ जाता है नियति के नियत समय पर , वस्तुएं ,,,,, प्रायः भस्म हो जाती हैं विचारों के वर्तुलाकार  वलय मात्र, शेष रह जाते हैं ब्रह्मांड में,,,, जीवित और जीवंत में  यही तो है एक विशेष अंतर ,,, तेरा और मेरा यह तो हर जीवित की जीवेषणा का है झगड़ा ,,, मदमस्त और मदान्ध में भेद काल की अंतिम कगार पर  पहुँच कर समझ आता है  गरिमा सदा ही ,, मौन पथगामिनी होती है  और अहंकार पग पग   शोर करते हुए चलता है सुनो ..... धरा और गगन के छोर पर ठहर तुम्हारा पल भर को मुस्कराना कहीं कुतूहल भरे दिनमान का कारण तो कहीं शीतल निशा को  स्वप्निल आमंत्रण बन जाता है,,, सुना कुछ तुमने ,,,? ओ सुनहरी,,, मेरी सुंदरी ,,,, चली आना चुपचाप, बिना किसी शोर और उलाहने के मन को बिना कोई पीड़ा दिए धरती के दोनो ध्रुवो के मध्य  खिंची ...

तुम रोमांचक बहुत हो

सुनो तुम... फिर न कहना मुझे कि... तुम रोमांचक बेशक बहुत हो मगर तुम्हे रोमांस करना बिल्कुल भी नही आता जानती हूँ मैं .. ये भी एक अदा ही है तुम्हारी मन के गूढ़ निगूढ़ भावों को प्राकट्य को विवश कर देने की.... देखना चाहते हो तुम झुकी पलकों के ऊपर शाम के सिंदूरी सुर्ख़ सूरज सी फिसलती हुई शर्मीली मुस्कान लाज के रेशम का आंखों की कोरों पर ठहर यकायक सपनीला हो जाना..... सुन लेना चाहते हो अचंभित सी मुस्कान लिए चेहरे पर उभर आये गालों के गड्ढों को चुम्बित करती दो लटों के मध्य लाज कुतरते हुए अधरों की मौन अभिव्यक्तियों  का अशाब्दिक तराना... सच तो यही है वासनाएं उँगलयों की पोरों पर बैठकर देह से शतरंजी खेल खेलती हैं और हृदय के तारों को छेड़ते मीठी तानाकशी भरे तुम्हारे ऐसे शब्द रोम रोम को झंकृत करते महसूस करते हैं परस्पर अजब स्पंदन ..... स्वासों की लय पर झुनक उठती है आकाशगंगाओं के नाज़ुक पैरों पर लिपटी हुई झांझरे टटोलते नही थकती फिर मुंदी पलकें रात की हथेली पर टिके अपने चाँद के चेहरे को जी भर ....... प्रियंवदा अवस्थी

क्या इसी मंज़र को उम्रदराज़ी कहते हैं

सुनो मुझ मे बसने वाले मेरे तुम.. तुम मुझमे पूर्णाकार लेने को अति विह्वल दिखते हो आजकल,,,, सफलता निष्फलता के ताप पर सिकीं ताजी मीठी रोटियों के निवालों पर मुँह के भीतर बैठी असंख्य स्वादेन्द्रियाँ अब वैसा द्रव्य नही लपेटती ,,, दिन महीने और सालों के , नवरस अनुभवों का आस्वादन कर सब कुछ अब समरस लगने लगा है,,,,, होने और न होने के मध्य उपज पड़ने वाली बेचैनियों की जड़ें अब जैसे सम और विषम के बीच शांतिवार्ता कर उसी बरगद के नीचे की भूमि पर बैठकर सुस्ताने को आतुर दिखती हैं जहाँ बैठकर कभी तुमसे क्यों क्या और कैसे के तर्क वितर्क किए थे प्रशंसा से भीतर सुख का रसायन उपजता तो है किंतु  वह अब उच्श्रृंखल नही होता आलोचनाओं की आँखों की तीक्षणताएँ अब मन को उतना विषाक्त नही करती ,,,, ग्राह्य अग्राह्य की सीमाओं के मध्य की रेखा पर ठहर कर उन्होंने हृदय और मस्तिष्क के मध्य चौखट पर नीलकंठ बैठा दिया है ..   अपेक्षित अनपेक्षित आहटों से हृदयगति उखड़ कर अब स्वतः ही थमने लगती है ,,,,, उन्हें थमने को किसी के सहारे की आवश्यकता नही पड़ती,,,,, सावन की रिमझिम फुहारें रोम छिद...

वह आश्वस्त नज़र आई

एक दिन ज़िंदगी ज़िंदगी देकर मुस्कराई.... बात समझ मे आई....न आई वह रोई फिर सम्हली और थोड़ा थोड़ा मुस्कराई वक्त के साथ करवट बदली , कुछ दिन घुटनो पर चली बैठी भी कुछ पल, फिर ज़िन्दगी के साथ उसने कदम ताल मिलाई...... किसी एक सुहाने से दिन वह  दो पंख ले आई..... सहमी, ठिठकी, फिर सुदूर गगन पर ज़िंदगी ने ऊँची छलांग लगाई..... बदलती ऋतु की मुंडेर पर किसी सन्नाती सी दोपहर वो एकांत में मिलने आई बलखाते शर्माते कानो में जाने क्या फुसफुसाई सुनकर वह कुछ झिझकी गालों पर गहराई ललाई...... शायद बात मन को थी लुभाई गुनगुनाते भरमाते उसने यूँ ही एक उम्र बिताई....... इस बार जबसे वो गई पलटकर बरसों पास न आई..... कभी कभी बस सपनों में दी दिखाई.... पल छिन उसे यहाँ वहाँ ढूंढते हाथ आई तो महज तन्हाई .... एक ढलती हुई साँझ आँगन उतरी उसकी सी परछाई मिलने की चाहत बेतहाशा दौड़ी ,,, छटपटाई शायद ज़िंदगी ने ज़िन्दगी से कुछ आस थी लगाई..... चौतरफा सिर्फ परछाई और परछाईं भर्राई गिड़गिड़ाई बेचारगी भी जताई ज़िंदगी ..... ज़िन्दगी पर नज़र फिराई कर्णभेदन करती अट्टहास लगाई घुटनो पर रेंगती याचना नख शिख तक तिल...

नेक समय आएगा इक दिन

नेक समय आएगा इक दिन सोचे मन की अभिलाषा बोलेंगे प्रियतम मुझसे जब मन से मन मिलती भाषा... ऋतु घूमे ज्यों एक चक्र पे काश प्रेम भी नियम बनाता चतुर्मास वो मिलन सजाता आठ मास बिरहा गा...

प्यास बाकी है

लम्हा लम्हा कुछ बीत रहा है मुझमें लम्हा लम्हा कुछ रीत रहा जीवन से जीत पाया न भरम उम्र एक करते तमाम कि लौट आओगे तुम दर्द भरी आहें सुनकर पल गुजरते गए जैसे दिन भी यहाँ कई गुज़रे दिनों का थामकर दामन बरस बरस गुज़रे ज़िन्द ठहरी रही मगर ये उम्र भला कब ठहरी  जिस्म की कोख तपिश रख गयी झुरियां गहरी राह कोई किसी भी मोड़ पर ठहर कर तुम फिर से आहट मेरे कदमों की जान लोगे तुम वक्त की चाक पर ठहरी हुई मिट्टी की तरह कांपते जिस्म को बोलो क्या थाम लोगे तुम बुझती नज़रें हैं ज्योत डगमग है बहुत जीवन की  आस की आँख में तिनके सी आँच बाकी है खोए पाए की फिकर ना ही कुछ मिला न मिला गम तेरी यादों का औ अधूरा साथ काफी है.. .. जिस्म खोखल पांव डगमग भीतर भरम  नही   सफ़र ए ज़िन्दगी अभी तेरी तलाश बाक़ी है,,,,, मुद्दतें गईं उन गलियों चौरस्तों को मिले बिछड़े  संग चलने की तेरे फिर भी प्यास बाक़ी है. प्रियंवदा अवस्थी

नयनो से उसका टकराना

नयनों का उससे टकराना रग रग हरियाली भर जाना मादकता भर उड़ चले पवन अंग अंग बसंत इक खिल जाना सिकुड़े ठिठके सब उठे लहक डालों नव अंकुर पड़े चिटक रस गन्ध सहित झूमा गुलाब इतराती धरा, अंगड़ाय रुआब चौखट दस्तक, लाया वसन्त तरुणाई खिली छाया वसन्त कलियों का तन पल्वित होना हृद -मध्य मचलता सा सोना खगकुल जोड़े ,मधुमास रचे और वसुंधरा नव बीज पके अति दिव्य प्रीत ऐसी अपनी अर्पण बस जिसकी रीत घनी  करतब, यह दृष्टि दशाओं का ऋतु तो बस खेल ,हवाओं का जित फिरे नयन यह उधर चली कभी बरखा बन कभी शीत ढली प्रियंवदा अवस्थी

कितने उज्ज्वल दृश्य हुए

स्पंदित हुए तार तार मन वीणा के,पदचाप भर से.... कितने उज्जवल दृश्य हुए तुम श्याम ! मेरी नज़र से.... झुकी झुकी सी बदलियाँ मुख मंडल से हटाते अलौकिक मुस्कान , मंद मंद मुस्कराते... स्तम्भित से चक्षु गात औ मूक -अधर तद्यपि गूंज उठे मन भीतर मुखरित सप्त स्वर.... लगी सिमटने सुर्ख साँझ नव वधू, रूप धर श्यामल से,इक कोने में..... चुपके चुपके पलक ओट कर प्रियतम डग पावन हो बिखरे  इधर उधर , कुछ सुर्ख गुलमोहर....... प्रियंवदा अवस्थी"© 2014

क्षितिज की मुंडेर पर

क्षितिज की मुंडेर पर पसरी हुई चटक स्याह ओढ़नी को हटाते चाँदनी के आंगन के उस पार ठीक पीछे वाली सघन नीम की छाँव के तले सुकोमल उंगलियों से समय की भुरभुरी मृदा पर अबूझी आकृतियाँ बनाते मिटाते बार बार मंद मुस्कराते खेलते देखा है अक्सर ही मैंने तुम्हें..... ऐ ज़िन्दगी..... ऐ वक्त.... तेरी इस धूप छाँव की लुकाछिपी से जूझते तुझे समझते और बूझते माथे पर ढुलकी अलकों की रंगत बेरंगत है हो चली  मन को ठहराव के अनवरत पाठ पढ़ाते एक तू ही है जो न बदली और एक वो  जो भुरभुरी माटी कुरेदते उससे रह रह खेलते न थका .... प्रियंवदा अवस्थी

प्रीत के पाखी को चिंता

प्रीति के पाखी को चिंता कब कोई बंधन मिले । लगन लगते लौह पिंजर तोड़ नभ वह उड़ चले ।। स्वप्न के पाँवों से बिछड़ें लाख घुँघरू नींद के बंद हो या जागती पलकों पे मदन नर्तन मिले ।। हो कटी जिह्वा भले और कंठ वाणी लोप हो। मौन के तट बैठ मन सौ बात करते ही मिले  ।। लोक के हों बन्ध या प्रतिबंध रोके मिलन को नयन मिलते नयन सों प्रिय प्राण इक होते मिले।। प्रीति के प्रियंवदा अवस्थी

सुन रे मन

सुन रे मन..... तेरे क्षण क्षण होते विचलन से कदमों तले की धरा रह रह क्यों कम्पित होती है? यद्यपि तेरी कोई नाप न ही तौल न ही तेरा कोई भार न ही तेरा कोई रूप स्वरूप फिर भी जाने कितने ही आ...