स्त्रियाँ बेहद सरल और सुगम्य होती है
सुनो मुझमें बसने वाले मेरे तुम तुम्हें अब तक न जाने कितनी ही पातियाँ लिखी जिन्हें एक एक कर करीने से सहेज रखा है मैंने दिनोदिन पुरानी और जर्जर होती सी सन्दूकची में किसी एक दिन जब तुम फुर्सत होगे और हम भी उऋण हो चुके होंगे रिश्तों के हर लेन देन से निकल चलूंगी तुम्हारे साथ नदी के समागम की मिठास से सम्मोहित ठहरे हुए अमावस के उस सागर की तरफ जहाँ तुमसे मेरी पहचान हुई थी बिठाकर तुम्हें वहीँ साहिल पर निसार दूँगी सब के सब तुमपर मेरे आँचल में भरकर.... मेरे हाथों में लिपटी स्याही देखकर अक्सर ही तुम्हारे कौतुक को खुद से उलझते देखा है मैंने सुनो तुम्हें ये कहते सुना हैअक्सर स्त्रियों को समझ सकना बड़ा कठिन है वे कब क्या और कैसे के व्यूह में उलझाए ही रखती हैं हमेशा पढ़ना तुम लहर लहर साहिल से अनवरत टकराती अनकहे ,,,,,,, गिरते थमते ,,,शोर करती स्त्री मन की जीवेषणा के उन अनगिनत मौन आग्रहों को जो चाहते हुए भी उसने कभी जग जाहिर नही किये .... वस्तुतः उन पत्रों में तुम्हारे मन मे रह रह कर उठते कुतूहल सा ऐसा कुछ विशेष भी नही दिन प्रतिदिन के मकड़जाल...