ऋतू तो खेल हवाओं का

नयनों से उसका का टकराना
रग रग हरियाली भर जाना
मादकता संग ले चली पवन
अंग अंग बसंत का खिल जाना

सिकुड़े ठिठके कण उठे लहक
डालों नव अंकुर पड़े चिटक
रस गन्ध सहित झूमा गुलाब
इतराई धरा, अंगड़ाये रुआब

चौखट दस्तक, लाया वसन्त
तरुणाई भरा छाया वसन्त
अधखिले पुष्प खिल-खिल उठना
हृद -मध्य दमक, झिलमिल सोना

खगकुल युगल ,मधुमास रचे
प्रकृति रत्न, नव बीज पके
है दिव्य प्रीत ऐसी अपनी
कण कण में बसी रीति घनी 

करतब, तव दृष्टि दशाओं का
ऋतु तो बस खेल ,हवाओं का
जित फिरी नज़र उत उत ये चली
कभी बरखा बनी कभी शीत ठनी
प्रियंवदा अवस्थी

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