मिलन मधुर था
मिलन मधुर था,,,,,,
कुछ जब हम तुम ढूंढ रहे थे
कल धुंधलाई दो आँखों में
अश्रु धार थी मौन प्रवण था
दो नयनो की मुलाकातों में ,,,,,
कजरे गजरे गज़र बिंधे सब
कम्पित तनमन रुंधे कंठ तब
चंद्रकलायें ठगी खड़ी थी
बिन मौसम की बरसातों में,,,,,,
विरह प्रथम या मिलन कथन हो
सुख दुःख का मिश्रित वर्णन हो
सागर मंथन तन मन भीतर
और सुधा हलाहल हाथों में,,,,,
प्रियंवदा अवस्थी
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