प्रीत भरे झगड़े

उनकी प्रीत ही कुछ ऐसी
बादल औ बरखा जैसी
मास दिवस जप तप कर
थे वो कभी मिल पाते
ऋतू देवो के पाँव दबाते
फिर भी न जाने क्यों
जब भी पास आते
बेबात आपस में टकराते....
चले आते घड़ घड़ातेे
न जाने कितने ही ताने
बिखर पड़ते इतस्ततः
मुंह बिचकाते ढेरों उलाहने...
भरकर लाता संग वो भी
विलम्ब के सौ मीठे बहाने
सजा देता इधर उधर
लगता कनखियों फिर मुस्काने...
अदेखी अनसुनी कर
रसोई जा ठहरती वो
लगती हांडी ठनकाने ....
तुनकते भुनकते झुनकते
खट्टी मीठी तीखी शिकायतें
एक एक कर लगती
परोसने और सजाने....
चला आता नज़दीक वो झूमता
पसर जाती आँखों आँखों
सावनी नम मुस्काने...
निकल पड़ती चुपके से पुरवा
चौखट को चूम
छोड़कर रिमझिम सौगातें...
हौले हौले कुछ गुनगुनाते
कानो में रस सा घोलते
कुछ फुसफुसाते
ये प्रीत भरे झगडे भी ना......?
कितने सुन्दर .....!!!!
सचमुच कितने सुन्दर....

प्रियंवदा

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