प्रीत बरसाओ ना
बहुत तरसी मेरी अँखियाँ
चिटकती हैं कोरी रतियाँ
की अब चले आओ ना
प्रीत बरसाओ ना
गर्द आँगन दर्द है मन
तपी है छत दीवारें सन्न
न अब तरसाओ ना
प्रीत बरसाओ ना
बुझे चूल्हे ठनक कुठले
उगे हैं धान कब उथले
गगन छा जाओ ना
प्रीत बरसाओ ना
सघन छाया मोर नाचा
दिशाओं चार शोर बांचा
ह्रदय भरमाओ ना
प्रीत बरसाओ ना
पखेरू प्यास से चीखे
तलैया ताल सब रीते
धरा पुलकाओ ना
प्रीत बरसाओ ना
अगन बरसे जेठ तरसे
आषाढ़ी चल पड़ी घर से
सवनिया गाओ ना
प्रीत बरसाओ ना
बिरह ज्वाला बनी हाला
छले काया बढ़े माया
नज़र फिराओ ना
प्रीत बरसाओ ना
पिया क्यों प्रीत में रूठे
लगे क्यों वचन सब झूठे
आके बतलाओ ना
प्रीत बरसाओ ना
प्रियंवदा
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