कि अभी ज़िंदा हूँ

होश किसको खबर किसे कि अभी जिन्दा हूँ
तमाम उम्र से जिस दर की मैं बाशिंदा हूँ....

जितना मशरूफ ज़माने की भीड़ में है वो
उतना बेख़ब्र भी लगता  मेरे ठिकाने से,
टूट जाए ये तिलस्म इसी आस में तो ज़िंदा हूँ

शोर करती हूँ रगों दिल में धड़क उठती हूँ
जिस्मो जीती हूँ मग़र कैद भी उसी में हूँ
उसके घर पल रही एक पर कटा परिंदा हूँ

कितनी आवाज़ दी उसे कभी सुने तो सही
मेरे हालात लिखूं उसकी हथेली पे कहीं
दिल पे रखेगा कभी हाथ इसलिए रिंदा हूँ,,,

झांकता भी है भीतर मगर क्यों देखता नही
बोलता भी है क्योंकर कभी वो सोचता नही
वो जिससे जिस्म उसकी जान के मानिंदा हूँ,
,,प्रियंवदा अवस्थी

Comments

Popular posts from this blog

मत बीतो ऐसे तुम मुझमे

बहुत दूर चलना एकाकी

पतझर के मौसम जवानी की फुनगियां