सब खबर मुझे है
तुम हाथ छुपाये रंग पिया
सब खबर मुझे है
तेरे चंचल नैन सधे हैं क्यों
सब खबर मुझे है
हाथ बटाने को क्यों आतुर
भोर भये काज सब मेरे
रंग ढंग ये बदला बदला
खोल रहा सब राज तेरे
ऊपर से हो मौन मगर
मन तेरा कितना मस्त मलंग
सब खबर मुझे है
आये जबसे परदेस मंझा
कर रहे बहुत ही सेवा
खिला रहे शबरी माफिक
चख चख कर लाये जो मेवा
बिन बांटे ही सिल पर
अँखियों जो चढ़ा भंग सा रंग
सब खबर मुझे है
बिसरी नही मोहे अब तक
पर बरस की होली
घर आँगन या अट बगिया
कोई थी जगह न छोड़ी
कर मनमानी बहुत भिगोया
जाने कौन निकाली रंज
सब खबर मुझे है..
प्रियंवदा
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