सांसे फिसल रही हैं

सांसें फिसल रही हैं
एक उम्र ढल रही है
दिल की जुबान अब कुछ
आँखों से कह रही है
यूँ ही बात बात में कब
बचपन गुजर गया
एक जिस्म जवानी की
दहलीज चढ़ गया
खोले जो उसने पट तो
महफ़िल शबाब पर थी
हर एक नज़र को देखा
सभी अपने आप पर थी
सपने ही थे खिलौने
संगी थे बहुत सारे
हर फ़िक्र जिक्र आते
उड़ जाती फूंक मारे
मुट्ठी में जोर था और
धड़कन में शोर काफी
उपवन में ज़िन्दगी के
कोई फूल था न बाक़ी
कल की फ़िकर कहाँ थी
पल पल मिली सौगातें
कब दिन चढ़ा ढली कब
पूनम अमाँ की रातें
चंचल चपल जो कल तक
वो चितवन ठहर रही है
धारा सी किसी जल की
अविरल वो चल रही है
लहरों के काँधे लगकर
एक एक लहर ठहर कर
जीवन की गूढ़ अपनी
कुछ बात कह रही है
परबत था कोई जिससे
फिसली मैं ज़िन्दगी
निर्देश के बिना ही
अधमुख हो चल पड़ी
रस्ते बनाये खुद ही
हर बन्ध तोड़ निकली
तट तट बनाये जिसने
घट घट वो छोड़ निकली
चलती रही बहती रही
बढ़ती मैं ज़िन्दगी
तन मन की धार करते
रिश्तों के धाम होकर
हर एक नगर डगर पर
जीवन के बीज बोकर
अनजान पथ की राही
अनुभव से पन्थ धोकर
पावन विलय को नित नित
सागर को चल रही है
एक उम्र ढल रही है....

प्रियंवदा

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