पंखुड़ियां सहेज रखी हैं
पंखुरियां सहेज रखी हैं
गुज़रे कुछ लम्हों की
इन हथेलियों के नीचे....
तुमको समेट बैठी हैं
कुछ यादें ,आज फिर
एक सूने झुरमुट के पीछे...
एक सावन था रीझा जिसपर
आज उसी एक डाली पर...
एक जीवन डोल गया जिसपे
उस एक गुलाब की लाली पर...
पलकें पिरो रहीं पतझर में
कुछ बौराए हरित से सपने
कूकी कभी कोयल जिन पर
उसी एक बगिया में अपने...
ऋतुओं का क्या कहूँ प्रिये
जिनका एक ही काम बस
बढ़ते दिनों को
एक एक कर है लीलना
क्या जाने ये पीड़ा विरह की
समझें क्या होता
वासंतिक वादों का झरना
और सीलना....
पंखुरियां सहेज रखी हैं मैंने....
प्रियंवदा ।
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