उस पार का सूरज
उस पार का सूरज
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बहुत खेले खेल हमने तुमने
लुका छिपी के, दिन उगे यहां
चलो अब निकलें हम बाहर
इस काठ के ताबूत से ,,,,
समय खींचने लगा रेखाएं
उम्र के माथे पर अपने ताप से,,
कुछ तो अब तय कर लें
मिलकर अपने आप से,,,
कुछ एक ज़रूरी सामान
जुटा लें अपनों के लिए
फिर शाम ढले चलेंगे दोनों
उस दरिया के किनारे,,,,
जहाँ कितनी ही बार हमने
सिलवटें धोयी थीं ज़िन्दगी की,,,
तुम्हारा हाथ थामे,
निश्चिंतता से,
ढलते हुए सूरज को निहारते,,,
रात का कंधों से ढलकना
फिर बिलकुल कठिन नहीं होगा
उस पार का सूरज देखो
नर्म घास बिछाने लगा है
ज़मीन के एक छोटे से टुकड़े पर
अभी से ही,,,
चलो अब निकलें हम बाहर
इस काठ के ताबूत से ,,,,
प्रियंवदा अवस्थी
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