ज़िन्दगी के रेखाचित्र

ज़िन्दगी
अब तक तुमने
जितने भी रेखाचित्र बनाये
भुरभुरी सूखी रेत पर
मिटने नही दिए मैंने
जिस दिन चाहो
पलटकर देख लेना
मेरी बन्द मुट्ठी को
कितनी भी फिसलन भरी
तासीर रही तुम्हारी
सहेज कर ही रखा तुम्हें
जिस दिन चाहो
पलटकर देख लेना
किसी दरिया के
छिछले नम किनारों को
तुम वहीँ मिलोगी
ठीक बिलकुल वैसी
जैसी उस एक दिन
यहाँ छोड़कर गयी थी खुद को
उस रात के सवेरे....
प्रियंवदा

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