क्या है शाश्वत और क्या नश्वर

एक मैं पूंछे है रह रह कर
मुझे बार बार
तुम तुम कहकर
गूँज रहे इन कानों में
कल तक रहे अपने
वो ही स्वर
क्या है शाश्वत और क्या नश्वर
कुछ भीतर भीतर टूट गया
उठ कंठ लगा फिर फूट गया
झिलमिल कर नैनो बह निकला
कुछ कहे बिना जो झर झर झर
क्या शाश्वत था और क्या नश्वर
एक काया में कितनी माया
नख शिख तक
क्या क्या ना उलझाया
दर्पण देखा अनदेखी कर
दिखे भ्रम या सच वो एक स्वर
क्या है शाश्वत और क्या नश्वर

प्रियंवदा

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