तुम्हारी सीली यादें

तुम्हारी सीली  यादे
हूकती हैं कसकती हैं
होकर भी जो तर ब तर
कभी बेहद तरसती हैं
तो कभी जी भर बरसती है

इस भुरभुरी मिटटी की
एक कच्ची सी बस्ती में
कुछ खटकती सी दीवारें
फिर आँखों से दरकती हैं

जब जब भी ये तन्हाई
मौन से फिकरे कसती है
बाहर पसरा घोर सन्नाटा
और बेतहाशा ये हँसती हैं

उठ इंसानो की बस्ती से
रख यादों को कश्ती में
वो लहरों पाँव रखती है
तेरी ओर निकल पड़ती है

कितने गुजरे हुए मंजर
वो स्वांसों में पार करती है
कहीं मेघ बन गरजती हैं
कहीं नेह बन बरसती हैं

प्रियंवदा।

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