हर कविता में तुम ही तुम

शब्दों में ढाला है तुमको
हर कविता में तुम ही तुम
चाँद बने काली रातों को
उगे प्रात आँगन भी तुम
ढले कभी नैनो मोती बन
किये कभी अधरों पे फेरे
तुम ही बरसे सूखी धरती
स्वप्न हरित तुमसे सब मेरे
तुम ही सावन तुम ही पतझर
तुम ही ऋतू वसंत बन आये
उपवन उपवन रंग अनेकों
तुम ही तो पुष्पों भर लाये
मिलन रचूँ या विरह लिखूं मैं
गीतों ने रस तुमसे पाये

प्रियंवदा

Comments

Popular posts from this blog

मत बीतो ऐसे तुम मुझमे

बहुत दूर चलना एकाकी

पतझर के मौसम जवानी की फुनगियां