एक वोही नही गुजरा करता

गुजरती रही मैं हर लम्हा
एक वो नही गुजरा करता
बसा भीतर कहीं मुझमे
तुम्हारा हूँ ..कहा करता...
शहर अपने में ही रहते
परायों से मिला करते
चमन इस में खिले गुल पर
भेंट काटों किया करते
थपेड़े धूप बरखा बिन
नही खिलता कोई एक दिन
कभी सहमा कभी मचला
ओढ़ लेता लड़कपन है
कभी इसका कभी उसका
कभी तनहा रहा मन है
बांवला भी सयाना भी
समय की धुन गुना करता
गुजरती हूँ मैं हर लम्हा....

प्रियंवदा

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