ओढ़नी जो थी

ओढ़नी जो थी...
ढांकना ही जिसका काम
कभी बुरी नज़रों से
कभी सूनी डगरों पे
कभी चिटकती धूप को
तो कहीं चमकते रूप को
कभी किसी एक रंग को
तो कभी किसी बदरंग को
समय अथवा बेसमय
ढांकती ही रही थी वो
नज़रों उथलाई सी
कुछ विवशताओं को
वैधव्य सी क्रूर
कुछ एक यातनाओं को
ओढ़नी जो थी..
तो ओढ़ लेना ही था अच्छा
माँ का ये कहना
लगा आज कितना सच्चा
मुझमे तुझमे सब में
भीतर रहता है एक मासूम बच्चा
दुनिया की तीखी नज़रों से जिसे
छुपा लेना ही होता है अच्छा
बेसबब बेबात ही जो
मुद्दा ए चर्चा बना देती है
और एक झीनी सी आड़
क्या  कुछ न बचा देती है
सो ...वो जो ओढ़नी थी
वो तो ...ओढ़नी ही थी.....

प्रियंवदा

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