रंग चूनर धानी
बरस झमक ओ मस्त मेघ
रंग चूनर धानी
पोर पोर पर लिख जावो
हरी भरी कहानी
प्रीत बिना तरसी बरसी
सूनी सी अँखियाँ
छेड़ पवन तू राग मल्हार
खिल जावें कलियाँ
पूस ठिठुरती रही कहूँ
विरहन ये काया
जाने कौन बात माघ
हमपे रिसियाया
किरन न झांकी जब एकउ
अंगना रिरियाया
अगन बरस परी जेठ
भानु ने बहुरि तपाया
माह बसन्त डाल ठुमकी
कोपल कुम्हलानी
बगियन बौर लगी अनगिन
तुम बिन मुरझानी
गहर उठो सगरे अम्बर
करो ना आनाकानी
झम झम करके उतर पड़ो
बरसावो पानी.....
प्रियंवदा
20/7/2015
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