माँ तुम सब कुछ कैसे जान लेती हो

माँ तुम सब कुछ कैसे जान लेती हो
परछाइयों तक के ग़म पहचान लेती हो

हथेलियां सुखाती हैं जब भी तपकर
किस्मत की कुछ नम लकड़ियाँ
हवाओं में घुलकर पलकों बिंधी
हर एक नमी एक फूँक में छान देती हो ...

ठिठुरे से दर्द लिपट गये जब करवटों
एक एक सिलवट संवार कर तुम
शीतल स्वप्न के उन्वान देती हो
बोलो ये चमत कैसे तुम अंजाम देती हो..

अदहन सी उफ़न पड़ी बेकल ये ज़िन्दगी
आ कांधे पे हौसला रखकर
थके हारे तनमन को थाम लेती हो
आँचल की कोर जाने क्या तुम बांध लेती हो ,,..

जीवन के ढंग बदले पर तुम नही बदली
कर्तव्य सबसे आगे, अधिकार बस यही ?
हर मोड़ पे नित नई पहचान देती हो
जन्म तो देती मगर कितने जीवन दान देती हो...

उलझन पड़ी गुथों को ऊँगली से है सँवारा
कमतर हुए जहाँ हम तुम बन गईं सहारा
बस एक गुहार सुनके धरती थाम लेती हो
काले सफेद बालों में सारा आकाश बांध लेती हो ...

माँ ! तुम सब कुछ कैसे जान लेती हो

प्रियंवदा अवस्थी 11/4/2014

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