लिखते प्रीत का स्वास्तिक
जीवन की वेदी पर
लिखते ही प्रीत की
स्वास्तिक,
न जाने क्या हुआ
इस ह्रदय को
बस यूँ ही....
कि देह से विदेह होकर
स्वयं का सब कुछ
प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष सजा कर
बैठ गया एक स्तंभित मन
आह् फिर कैसी हवि
और क्या हवन
क्या क्या न होता गया आहुत
अनादेश बिना आह्वाहन
छा गयी हर ओर
बस सुगंध ही सुगंध
गुंजायमान होने लगे
अनंत आकाश में
उर्ध्वगामी हुए कुछ मौन स्वर
लौटते रहे जो बारम्बार
मुझमे बस तुम्हें ही छूकर
प्रियंवदा
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