मेरे आकाश पर तुम
निबाहो प्रीत एक सी तुम जरूरी ये नही प्रियतम
मेरे आकाश पर तुम चन्द्र की तरह मिला करना ।
निपट लूँगी अंधेरों से झलक मिलती रहे नित प्रति
चले आना किसी पूनम अमावस की व्यथा कहना ।।
प्रकृति तेरी मैं पहचानूं जगत पर प्रीत गाढ़ी है
प्रेम की सुर्ख चूनर पे सदा से युति ही काढ़ी है
उजाले सौप दो जग को कोई पीड़ा नही हमको
मेरे अभिमान पथ संगी हृदय में तम नही करना ।।
मिलन दो आत्माओं का क्या समझे मूढ़ ये काया
छले है उम्र जिसको नित कठिन इसकी बड़ी माया
प्रिया प्रिय की हुई जबसे नयन नैनो को पहचाने
अगिन तारक भले संगी भेद मुझ संग नही करना ।।
मुझे संज्ञान हो खिलते गगन तुम दिन कई बीते
नियति के चक्र पर चलके खिले भी औ कभी रीते
नियम उपकार के जितने निभा लो तुम औ हम भी
आस के थिर जलाशय तुम कभी मंथन नही करना ।।
चपल चंचल बनूँ तुमसे लवण घुले क्षीर सागर में
प्रीत की बूंद तप आ बैठती सूने अम्बर की गागर में
नही आशय धरा उतरो तभी हो सिद्धि वांछित की
विकल हृद की हिलोरों पर जरूरी हाथ का रखना ।।
प्रियंवदा अवस्थी
Comments
Post a Comment