मैक़दे जब भी जाता हूँ

मैक़दे जब भी जाता हूँ  तभी मुलाक़ात होती है ।

एक मेरी अब वहीँ उससे दिल की बात होती है ।।

ढूंढते फिरता था जिसको मैं होकर खानाबदोश।

वो जिसके वास्ते दिन ही न ही कोई रात होती है ।।

वो मय मेरी है साक़ी भी है औ पैमाना भी उसका है 

उसकी उल्फ़त में बढ़ता जा रहा ये मेरा रुतबा है ।।

कि लुट जाना औ मिट जाना औ खो जाना नही मालूम

इश्क़ में कब कहो शामिल कोई एक जात होती है।।

हुस्न से इश्क का रिश्ता ये तो कायनात का सच है

नही होता कभी इस पे किसी आदम का ही बस है

इश्क का नूर मिल पाता है शिद्दत ए ख़ाकसारी से

ये जितनी सुर्ख होती है वोे उतनी ही पाक़ होती है ।।

टुकड़े टुकड़े मुलाकातों कहो क्या बात हो अपनी

मुकम्मल दिन जो हो जाये तो पूरी रात हो अपनी

डूब जाऊँ मैं लेकर ख्वाहिशें एक उम्र की उसमे

ये सांसें उसकी खिदमत रोज़ ये ज़ज़्बात बोती है ।।

जहाँ के रिश्तों नातों के अजब ही अंजाम देखे हैं।
ये जितने दीखते उजले उतने ही बेईमान देखे हैं ।।
तभी तो सर झुकाया है ओ मेरे साक़ी तेरे हक में
मुझे मालूम अब ना हो कि जिस्म में जान होती है ।।

प्रियंवदा

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