मुझे याद अब भी
वो एक रात थी जब गगन और था कुछ
पवन की सुनी उसने बातें जो चंचल
खिली बारिशों से,जब नहाई थी राहें
और मुस्कान होठों, शरारत सनी थी .....
बुने ताने बाने सुरख शाम ने थे
जो कुछ गुनगुनाते हुए ढल गयी थी
सजाने लगा नभ जवाँ चांदनी को
वो थी एक अमावस जो पूनम बनी थी
मुझे याद अब भी तेरे साथ गुजरी
अरमानो भरी वो एक रात अपनी.....
नमी रेत पर जब उकेरे थे सपने
रखकर मेरा सर तेरे बाजुओं पर
कदम चूमते तब निगोड़ी वो लहरे
मेरे हर्फ़ों जाने चुरा क्या रही थी
वो एक बार आ पलट लौटकर फिर
सागर के कानों कुछ कहे जा रही थी
मदहोश हम इनसे एक दूसरे की
आँखों के सपने जिए जा रहे थे ...
मुझे याद अब भी तेरे साथ गुजरी
अरमानो भरी वो एक रात अपनी
अंधेरों उजालों की किसको खबर थी
तेरी एक निगाह, मेरी एक नज़र थी
सांसों तरन्नुम, हवा महकी महकी
ख्वाहिश बहकती जवानी सिमटती
जगमग थे दोनों उजालों जो देखा
कि दो जिस्मों कितने सितारे सने थे
हाँ थी वो अमावस मग़र मेरे पहलू
तुम्ही चाँद बन कितने पूरे खिले थे
मुझे याद अब भी तेरे साथ गुजरी
अरमानो भरी वो एक रात अपनी....
प्रियंवदा
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