प्रीत का फ़लसफ़ा

प्रीत का अजब ही फलसफा
कि कई बार जब
ये एक अकेला मन
मन का ही नही रहता ....
रहकर भी एक तन भीतर
इसकी सीमायें तोड़कर
कितने ही विग्रह हो जाते इसके
भागते फिरते फिर इधर उधर
प्रिय की मीठी बातें सुन
कडवे खट्टे कुछ ताने सुन
कल मोर बनकर नाच उठा
आज टिटहरी सा टेरने लगा
कब चाँद बन चांदनी बिखेरी
तो बादल बन उसे ही घेरने लगा
इस ठौर तो कभी उस ठौर
रे मन तू बड़ा चितचोर
प्रियंवदा

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