मूरत से सूरत बना दोगे
स्तब्ध हो जाती हूँ
तुम्हारी कल्पनाओं से
किन्चित चकित भी
कभी पत्थर से दरिया बहाते हो
कहीं पानी मे आग लगाते हो
मौत में जीवन के
स्वप्न-बिछौने बिछाते हो
तो कभी जीवन को
मृत्यु मरीचिका बतलाते हो
अजब है दुनिया तुम्हारी
गज़ब तुम्हारी ये चित्रकारी
जानती हूँ मैं एक दिन
तुम मुझे मूरत से सूरत बना दोगे
अपनी जादूभरी नज़रों से
आभास है कुछ कुछ
बहुत कुछ छुपा रखा है तुमने
अपनी उस झोली में
जिसे छुपाते फिरते हो
दुनिया से .....मुझसे
न जाने क्यों
प्रियंवदा अवस्थी©2013
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