प्रिय तुम बैठे थे पास
रात्रि नींद जब आ बैठी इन पलकों को सहलाते ।
प्रिय बैठे आ निकट मेरे जग को ज्यों झुठलाते ।।
मंद सुगन्धि पवन लाई रच जिसको दोनों महके
मुखरित होकर अधर रुके जाने क्या कहते कहते ।।
साँझ फुसफुसा गई कानों जो खुसर फुसर सी बात।
आँजन रचने लगी निशा छोड़ कर अध पौने काज ।।
दो मुट्ठी कुछ लाए अपने लगे रात कुतुहल रचने
कहो पसारुँ किसको पहले नैन लगे नैनों को ठगने ।।
प्रीत लजाई अह अलबेली सुर्ख कपोल खेलते होली।
अंगड़ाई तनमन अठखेली सीझा अँचरा भीजी चोली ।।
पतझर पात पात मुस्काए मन में फागुन की धुन गुन ।
खिल खिल उठे पलाश अंग उन स्वप्नों की बातें सुन।।
प्रियंवदा©2014
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