तुम आओ तब दीप जलाऊं

तुम आओ तब दीप जलाऊँ
जीवन के हर तिमिर भगाऊँ
रुच रुच माटी छानी काढ़ी
इन हाथों ले प्रिय मैं ठाढ़ी
दो हाथों ना बने दियाली
तुम बिनु कैसे मने दिवाली
आस की कलियाँ फूल बनाऊं
मन आँगन घर द्वार सजाऊँ
तुम आओ तब दीप जलाऊँ ।।

दिन दिन जव अट्ट धान सुखाए
चुन चुन जीवन भार भुंजाये
अँसुवन मिसरी डली बनाई
भर भर मुठियन थाल लगाई
अनुक दीप चुप बैठी बाती
काल निशा बन जाये न राती
तुम आओ तब अगन जगाऊँ
छपन भोग तेरे संग बनाऊं
तुम आओ तब दीप जलाऊँ।।

सावन भीजा भादों सीझा
अब पतझर चहुँ दिस है रीझा
खेत खड़े खलिहान पड़े हैं
तुम बिन सब बेनाम पड़े हैं
नई फसल की आई बारी
कर बैठी हूँ सब तैयारी
कब तक छूंछे धान पसाऊं
तुम आओ नव फसल लगाऊं
तुम आओ तब दीप जलाऊँ ।।

प्रियंवदा अवस्थी

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